वास्तु शास्त्र: वास्तुकला का विज्ञान

घर का अच्छी तरह से बनाया गया लेआउट आपके जीवन को खुशियाें से भर सकता है। सुनकर आश्चर्य हो रहा है? वास्तु शास्त्र इसी में हमारी मदद करता है। अन्वेषणशील वास्तु विज्ञान आशावादी और सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह के माध्यम से किसी दिए गए स्थान पर कार्य करने वाली सभी शक्तियों को समाहित करता है। सही तरह से वास्तु सिद्धांतों का अनुसण करने से जातक को नकारात्मक कंपन को दूर करने और समृद्धि को आकर्षित करने के लिए रूपरेखा मिल जाती है। वस्तुत: इसका प्रारंभ भारत में हुआ और मौजूदा समय में समूचे विश्व में इसका विस्तार हो चुका है। अब लोग निर्माण से पहले कुछ चीजों के दिशा और रखने के स्थान का ध्यान रखते हैं।

इसके अलावा वास्तु शास्त्र निश्चित स्थान के उचित स्पंदनों को प्रोत्साहित करने में मदद करता है और उसे बुरी नजर लगने से बचाता है। कोई भी व्यक्ति जो उस स्थान विशेष के संपर्क में आता है, वह भी उन्हीं वाइब्स से जुड़ जाता है जिससे उसे स्वस्थ तन, मन और आत्मा की प्राप्ति होती है। प्राचीन समय में केवल हिंदू और बौद्ध धर्म के लोग वास्तु के अनुसार चीजों को बनाने में विश्वास रखते थे। जबकि आधुनिक युग में लगभग सभी समुदायों ने अपने जीवन में सकारात्मकता और कल्याण को आकर्षित करने के लिए ज्योतिष में वास्तु विज्ञान को अपनाया है।

वास्तु के अनुसार किसी ऐसी जगह में प्रवेश करना जो निर्माणाधीन हो यानी जिसकी बनावट पूरी न हुई हो, वह आपके जीवन में कई तरह की परेशानियों को बढ़ा सकती है। आप घुटन महसूस कर सकते हैं, उस जगह की नकारात्मक ऊर्जा आपमें प्रवेश कर सकती है, आप अस्वस्थ हो सकते हैं, भावनात्मक परेशानी भी हो सकती है आदि। वास्तु-संगत घर प्राप्त करने से इन सभी परेशानियों से छुटकारा पाने में मदद मिलती है। साथ ही आपको कई तरह के बेहतर अनुभव भी मिलते हैं।

वास्तु शास्त्र कैसे काम करता है?

वास्तु शास्त्र मूल रूप से संरचनाओं के तीन मजबूत सिद्धांतों पर काम करता है, जो इसके पूरे आधार को कवर करते हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण है, भोगद्य। यह दर्शाता है कि डिज़ाइन किया हुआ परिसर इस्तेमाल में सहज और उपयोगी होना चाहिए। दूसरा है सुखा दर्शन। इसमें डिज़ाइन किया गया परिसर सौंदर्य की दृष्टि से मनभावन होना चाहिए। खाली स्थान का विभाजन और उसमें उपयोग किया गया कच्चा माल जिसमें रंग, दरवाजों और खिड़कियों के आकार, कमरे और उनका प्रदर्शन खूबसूरती से होना चाहिए। आखिरी है, रम्या। यह वह जगह होती है, जहां भवन का निर्माण किया जाता है। इस जगह के संदर्भ में जातक के मन में कल्याण की भावना उत्पन्न होनी चाहिए।

इसके अलावा, वास्तु का मानना है कि दो मुख्य ताकतें हैं जो समान रूप से और विपरीत रूप से प्रकृति में मौजूद हैं। यह अंतःक्रिया एक बायोफोर्स जोड़ती और बनाती है- प्राण। जातक को जीवित रहने के लिए इसकी आवश्यकता होती है। इन फोर्सेस में से एक स्पष्ट और सूक्ष्म है, जबकि दूसरी सघन और अन्धकारमय है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि एक बल सकारात्मक है और दूसरा नकारात्मक है। उस स्थान का वास्तु बनाने वाली इन शक्तियों की तीव्रता एक समान नहीं हो सकती है। लेकिन, इन ताकतों का पारस्परिक प्रभाव निरतंर बना रहता है।

वास्तु शास्त्र का इतिहास

भारतीय सभ्यता में वास्तु शास्त्र सबसे पुरानी प्रथाओं में से एक है। सदियों से, यह लोगों की समृद्ध विरासत में सहायता करता रहा है और पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के अध्ययन का उपयोग करके अनुशासन विकसित किया है। चुंबकीय बल के साथ गुरुत्वाकर्षण बल का उपयोग करके लोग अपने जीवन से नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करते रहे हैं। निर्माण के दौरान, लोग इन सभी तत्वों का उपयोग अपने जीवन का पोषण करने और आध्यात्मिक रूप से अपने लिए चीजों को बेहतर बनाने के लिए करते हैं।

वास्तु शास्त्र के पांच तत्व

वास्तु शास्त्र पांच तत्वों से बना है। उनका अपना विशिष्ट अर्थ और भूमिका है। साथ ही वास्तुकला में उनकी कार्य क्षमता बहुत अधिक है।

पृथ्वी (Earth)

भूमि या पृथ्वी का अपना चुंबकीय बल है और यह आकर्षण के केंद्र- उत्तर और दक्षिण के ध्रुवों से बना है। भू-दृश्यों, वनस्पतियों, जीवों और भूमि से निर्मित, यह स्थानीय निर्माण के लिए कच्चा माल भी प्रदान करता है, जिनकी अपनी व्यवहार्यता होती है। भूमि पूजन इसलिए किया जाता है ताकि भूमि निर्माण से आने वाली अनिष्ट शक्तियों को दूर किया जा सके।

जल (water)

यह नदी, समुद्र, बारिश और अन्य जल निकायों के साथ-साथ पानी के अन्य रूपों द्वारा दर्शाया गया है। इसके अलावा, यह हर जानवर और पौधे के हिस्से से बना है। साथ ही, भौतिक जीवन और आवास जल का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह सभी पारिस्थितिक संस्कृतियों और जीवन रूपों के लिए मान्य है। जीवन का रूप, स्वरूप और हर प्रकार के जीव जिनका सहसंबंध जल और पृथ्वी पर निर्भर करता है।

वायु (Air)

यह एक जीवन-समर्थक तत्व के रूप में दर्शाया गया है। धूल के कणों, आर्द्रता आदि के साथ-साथ अनेक तत्वों से मिलकर यह बना है। यह प्रासंगिक अनुपातों में बांटा गया है। यह त्वचा, रक्त, प्रणाली और श्वसन के माध्यम से पूरे शरीर से भी संबंधित है। इसके अलावा, यह गति का प्रतीक है और इसकी शुद्धता अच्छे मस्तिष्क, शरीर और रक्त के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है।

आग (Fire)

यह गर्मी को दर्शाता है और सूर्य को इसका सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है। दिन और रात की अवधारणा से लेकर ऋतुओं तक, सूर्य उत्साह, जोश और जुनून का उत्कृष्ट स्रोत है। यह जातक को मानसिक स्वास्थ्य प्रदान करता है और ऊर्जा के प्रमुख स्रोत के रूप में कार्य करता है। इससे स्पष्ट होता है कि यह जातक का विकास करता है और जीवनशक्ति के महान स्रोत के रूप में कार्य करता है। परिवर्तनशील जलवायु वाले विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट संस्कृतियां होती हैं, और सूर्य उनकी प्राकृतिक प्रगति में वृद्धि करता है।

आकाश (Space)

उपर्युक्त तत्व भावनात्मक रूप से सुखद, बौद्धिक रूप से आश्रय निर्धारक और आदत के कुशल निर्माता हैं। वहीं ये तत्व बलों, गर्मी, प्रकाश, चुंबकीय क्षेत्र, वनस्पतियों और जीवों आदि के साथ मिलकर भौतिक आराम और आनंदमय स्थान प्रदान करते हैं। ये सभी मिलकर बहुतायत से जीने और उसके अनुसार विकसित होने के लिए आदर्श निवासस्थान बनाते हैं।

जैसा कि वास्तु शास्त्र इन उल्लेखित तत्वों पर काम करता है, व्यक्ति वास्तु संबंधी समस्याओं या वास्तु दोष को दूर करके अपने जीवन में सकारात्मक ऊर्जा की प्रभावशीलता में सुधार कर सकता है।

वास्तु दिशा और उनके प्रभाव

वास्तु शास्त्र में दिशा और उसके प्रभाव का अपना महत्व होता है।

पूर्व दिशा

सूर्य पूर्व दिशा का स्वामी है। जातकों को पूर्व दिशा को खुला रखना चाहिए और प्रकाश को इसमें प्रवेश करने देना चाहिए क्योंकि यह संपन्नता और समृद्धि को आकर्षित करता है। यदि पूर्व दिशा को लेकर कोई समस्या होती है, तो इस वजह से पिता-पुत्र के बीच विवाद उत्पन्न होता है और स्वास्थ्य को लेकर कई अन्य समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

पश्चिम दिशा

वास्तु शास्त्र में शनि, पश्चिम दिशा का स्वामी है। पश्चिम दिशा में किसी तरह की समस्या होने पर घर के बिजली के उपकरण ठीक से काम नहीं करते। इसके साथ ही, इससे परिवार के सदस्यों को वायुजनित (हवा के जरिए फैलने वाले रोग) रोगों तथा हड्डियों और पैरों में दर्द की समस्या का सामना करना पड़ता है।

उत्तर दिशा

उत्तर दिशा का स्वामी, बुध है। यह धन, समृद्धि और लाभ को दर्शाता है। यदि दिशा अनिष्ट शक्तियों के अधीन हो, तो आर्थिक परेशानी के साथ-साथ नाक और गले के रोग आदि समस्याएं हो सकती हैं। साथ ही, जातकों को लगातार बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

दक्षिण दिशा

दक्षिण दिशा का स्वामी मंगल है। यह कानूनी मामलों और रिलेशनशिप से संबंधित है। यदि इस दिशा की ओर कोई परेशानी या वास्तु दोष उत्पन्न होता है, तो इसकी वजह से लोग कानूनी अड़चनों में उलझ सकते हैं और बड़े भाई के साथ भी विवाद उत्पन्न हो सकता है। साथ ही, परिवार के सदस्यों को रक्त संबंधी बीमारियां होने की संभावना बढ़ जाती है।.

उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशा

इस दिशा का स्वामी बृहस्पति है। इसे सबसे शुद्ध और निष्कलंक दिशा माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, ईशान कोण देवताओं द्वारा शासित होता है। लोगों को इस दिशा में अपने वॉशरूम या कूड़ाघर नहीं बनाना चाहिए। साथ ही इस दिशा को हमेशा साफ-सुथरा रखना चाहिए। इस दिशा में कोई भी वास्तु दोष धन में गिरावट और पारिवारिक समस्याओं का कारण बन सकता है। इसके साथ ही विवाहित जोड़ों के बीच उनकी शादीशुदा जिंदगी से जुड़ी परेशानी और स्वास्थ संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं।

उत्तर-पश्चिम (वायव्य) दिशा

उत्तर-पश्चिम दिशा का स्वामी चंद्रमा है। इस दिशा में जो परेशानियां हो सकती हैं, वे हैं पड़ोसियों के साथ विवाद, घर में मां का निरंतर बिगड़ता स्वास्थ्य। यदि कोई युवती अविवाहित है, तो उसके विवाह योग में विलंब हो सकता है। इसके अलावा, मानसिक तनाव, खांसी, जुकाम आदि समस्याएं भी हो सकती हैं।

दक्षिण-पूर्व (अग्नेय) दिशा

शुक्र अग्नेय दिशा का स्वामी है और अग्नि तत्व को नियंत्रित करता है। इसलिए इस दिशा में किचन बनाया जाना चाहिए। यदि दक्षिण-पूर्व दिशा में वास्तु दोष है, तो घर में लगातार समस्याएं बनी रहेंगी। घर की महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी समस्या बनी रहती है। विवाहित जोड़ों के बीच अशांति, गलतफहमी जैसी कई परेशानियां बनी रहती हैं। किरायेदारों के साथ भी गलतफहमी हो सकती है। इसके साथ ही, गर्भाशय, मधुमेह आदि जैसी अन्य चिकित्सकीय समस्याएं भी हो सकती हैं।.

दक्षिण-पश्चिम (नैरुत्य) दिशा

राहु दक्षिण-पश्चिम दिशा को नियंत्रित करता है। लोगों को अपना मास्टर बेडरूम नैरुत्य यानी दक्षिण-पश्चिम दिशा में बनाना चाहिए। इस दिशा में दोष, पितृ दोष और मातृ-पितृ पक्ष से संबंधित समस्याओं का कारण बन सकता है। इसके अलावा, घर में चोरी की संभावना भी बढ़ जाती है, और परिवार के सदस्य दुर्घटनाओं, बीमारियों, मस्तिष्क संबंधी परेशानियों आदि के शिकार हो जाते हैं।

ब्रह्म स्थान

जैसा कि नाम से पता चलता है, भगवान ब्रह्मा इस पर शासन करते हैं। आपके घर का मध्य भाग ब्रह्म स्थान कहलाता है। इसे विशाल, मुक्त और स्वच्छ रखना चाहिए। इस स्थान में वास्तु दोष से जीवन में अड़चनें पैदा होती हैं, और परिवार में अक्सर कोई न कोई सदस्य बीमार रहता है। यदि स्थिति और बदतर हुई है, तो जातक के साथ असामान्य यानी पैरानॉर्मल (इंसान और विज्ञान की समझ से परे) घटनाएं हो सकती हैं। इसलिए, ब्रह्म स्थान हल्का और मुक्त होना चाहिए।.

वास्तु शास्त्र और ज्योतिष

वास्तु और ज्योतिष का संबंध शाश्वत है। दोनों शाखाएं आपस में जुड़ी हुई हैं और दोनों अपने-अपने स्तर पर लोगों की मदद करती हैं। जैसे कोई वास्तु के अनुसार अपना घर बनवाता है और शुभ मुहूर्त जैसे ज्योतिष की अवधारणाओं को मानते हुए गृह प्रवेश करता है। इस तरह वास्तु और ज्योतिष का संयोजन जातक के घर में सकारात्मकतो को बढ़ावा देता है। साथ ही लोग इनकी मदद से अपने निर्माण के स्थान से बुरी भावनाओं और अवांछित प्रभावों को दूर करने में सक्षम होते हैं।

इसके अलावा, वास्तु का कहना है कि निर्माण स्थल का पूर्वोत्तर भाग सौर आधा (solar half) है जबकि दक्षिण पश्चिम को चंद्र आधा (lunar half) माना जाता है। लोगों को सौर का आधा भाग चंद्र आधे भाग से कम रखना चाहिए। यदि इसे किसी ज्योतिषी की सलाह से उचित समय और स्थान पर किया जाए तो यह सूर्य की किरणों, ध्रुवीय ऊर्जा और सौर विकिरण के साथ-साथ प्रसन्नता, खुशी और आनंद का सर्वोत्कृष्ट विभाजन करता है।

वास्तु शास्त्र का महत्व

वास्तु शास्त्र का उपयोग करके लोग कई तरह के काम कर सकते हैं। वास्तु विद्या का उपयोग करके जातक अनुकूल और प्रतिकूल परिणामों का पता लगा सकते हैं। साथ ही, यह उचित लंबाई, चौड़ाई, दिशा आदि का निर्धारण करने में मदद करता है। इसके अलावा यह निम्नलिखित तरीकों से भी आपकी मदद करता है:

  • यह रहने या काम करने की जगह तक ब्रह्मांडीय ऊर्जा को ले जाने में मदद करता है। इसके अलावा, आप वास्तु के पांच तत्वों में आसानी से सामंजस्य बैठा सकते हैं। साथ ही, उचित वास्तु सुझाव के साथ, आप शिक्षा, करियर, वित्त और अन्य प्रयासों में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
  • इसके साथ, आप अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों जैसे रिश्ते मधुर होंगे और अपने साथी के साथ सामंजस्य बेठा पाएंगे।
  • वास्तु आपके जीवन में मौजूद समस्याओं को दूर करने में भी सहायक है। उपयुक्त वास्तु की मदद से आप खुद को आध्यात्मिक रूप से विकसित कर सकते हैं और कई तरीकों से खुद में सुधार कर सकते हैं।
  • वास्तु शास्त्र की मदद से लोग अपने जीवन और निर्माण स्थान को अधिक फलदायी बना सकते हैं।
  • फ़र्नीचर से लेकर कई सजावट की वस्तुओं का सही उपयोग करने से आप अपने वास्तु को बदल सकते हैं और उसे सही कर सकते हैं।
  • उपयुक्त वास्तु यह भी सुनिश्चित करता है कि जातक के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, चीजों की बहुलता और सकारात्मक ऊर्जा का मुक्त प्रवाह हो।
  • वास्तु दक्षता और रचनात्मकता को जीवंत माहौल में बदलने में मदद करता है, जो गतिशीलता और सद्भावना का संचार प्रदान करता है। इस तरह वास्तु का महत्व और भी बढ़ जाता है।
  • यह कहने की जरूरत नहीं है कि वास्तु विज्ञान का उपयुक्त दृष्टिकोण ऊर्जा के सभी प्राकृतिक स्रोतों को साथ लाता है और अच्छे प्रभावों को बढ़ाता है।
  • वास्तु दोषों में सुधार करके हजारों लोगों की दैनिक जीवन की परेशानियों को हल करने में मदद करता है। इसके अलावा, यह उन्हें जीवन में सभी अड़चनों और बाधाओं को खत्म करने में सहायता करता है। यह उनके रहने की जगह को संशोधित या दोष मुक्त करता है और लोगों को अपने आपको बेहतर तरीके से स्थापित करने में भी मदद करता है।

आधुनिक वास्तुकला में वास्तु का महत्व

वर्तमान पीढ़ी ने प्रकृति के पांच तत्वों सहित भगवान ब्रह्मा द्वारा निर्धारित प्राचीन निर्माण प्रथाओं के महत्व को स्वीकार करना शुरू कर दिया है। वास्तु विज्ञान को आज के निर्माण में शामिल करने के अंतिम परिणामों ने लोगों को आर्थिक और पर्यावरणीय परिदृश्य से बाहर निकलने में मदद की है। इसके साथ ही लोगों ने अपने दैनिक जीवन में आने वाली सभी समस्याओं और परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए समकालीन विचारों को प्राचीन विचारों के साथ शामिल करना शुरू कर दिया है।

इसके अलावा, बुनियादी सुविधाओं के साथ, लोग वास्तु-विशिष्ट स्थानों की भी तलाश करते हैं ताकि वे स्वास्थ्य, धन, शांति और किसी भी वस्तु की बहुतायत को आकर्षित कर सकें। इस प्रकार उनका मुख्य लक्ष्य है एक ऐसा स्थान प्राप्त करना है, जो उन्हें जीवन में आगे बढ़ने में मदद करे।

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