काला जादू का सच : प्रक्रिया, उपाय और वशीकरण मंत्र

काला जादू का सच : प्रक्रिया, उपाय और वशीकरण मंत्र

काला जादू

काला जादू का नाम सुनते ही, बंगाल राज्य का नाम दिमाग में घूमने लगता है। लेकिन आप को हैरानी होगी की काले जादू का प्रयोग अफ्रीका में भी होता है। अफ्रीका में काले जादू को गुडू नाम से जाना जाता है। इसकी मुख्य विशेषता है, इसमें इस्तेमाल होने वाले जानवरो के शरीर के हिस्से और पुतले जिनका उपयोग सालो से करते आ रहे है। लेकिन सामान्य लोगो के लिए काला जादू आज भी एक रहस्य है।

कैसे हुई काला जादू की शुरुआत ?

अफ्रीका व अन्य देशो में काला जादू को “वुडू” कहा जाता है। ऐसी मान्यता है की 1847 में एर्ज़ुली दंतोर नाम की देवी एक पेड़ पर अवतरित हुई थी। उन्हें सुंदरता और प्यार की देवी माना जाता था। उन्होंने कई लोगो की बीमारिया जादू से दूर कर दी। एक पादरी को यह सब पसंद न आया, और उसने पेड़ के तने को जड़ से काटने का आदेश दे डाला। बाद में स्थानीय लोगो ने देवी की मूर्ति बनायीं और पूजन शुरू कर दिया।

काला जादू की प्रक्रिया :

काला जादू

तंत्र -विज्ञान के अनुसार ये एक बहुत ही दुर्लभ प्रक्रिया है, जिसे बहुत ही विशेष परिस्थिति में अंजाम दिया जाता है। इसे करने के लिए उच्च स्त्तर के विशेषज्ञ की जरूरत होती है। पर कुछ ही लोग इसे करने में सच्छम होते है। प्रक्रिया में एक मूर्ति जो की गुड़िया जैसी दिखती है, उसका प्रयोग होता है। यह मूर्ति विभिन्न प्रकार की खाद्य वस्तुओ जैसे आटा, बेसन, उरद की दाल से बनाया जाता है। इसमें विशेष मंत्रो से जान डाली जाती है। इसके उपरान्त जिस भी व्यक्ति के ऊपर काला जादू करना हो उसके नाम का उच्चारण किया जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया में जानवरो के अंगो से समस्या समाधान का दावा किया जाता है। पूर्वजो की आत्मा को भी किसी शरीर में बुला कर काम करवाया जा सकता है। इसके अलावा दूर बैठे इंसान के इलाज के लिए भी पुतले का उपयोग किया जाता है।

क्या है सच ?

विशेषज्ञो का मानना है की काला जादू और कुछ नहीं , सिर्फ ऊर्जा का समूह है। जो की सिर्फ एक इंसान से दुसरे इंसान पे भेजा जाता है। ऊर्जा का इस्तेमाल हम सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूप से कर सकते है। सनातन धर्म का अथर्व वेद सिर्फ वस्तुओ के सकारात्मक और नकारात्मक इस्तेमाल को ही समर्पित है। आपको यह समझना होगा की ऊर्जा सिर्फ ऊर्जा होती है, वह न तो दैवीय होती है न ही सैतानी

गीता में अर्जुन ने कृष्ण से पुछा है की प्रत्येक वास्तु ऊर्जा से निर्मित हुई है और ऊर्जा दुर्योधन में भी है। फिर क्यों दुर्योधन निर्गुणो वाले काम क्यों कर रहा? : जवाब में कृष्ण ने कहा ईश्वर निर्गुण है। दिव्यता निर्गुण है। उसका अपना कोई गुण नहीं है। इसका अर्थ है की ऊर्जा विशुद्ध है और आप उससे कुछ भी निर्माण कर सकते है।

कब किया जाता था काला जादू ?

विशेषज्ञों का मानना है, की पुतले से किसी व्यक्ति को नुक्सान पहुँचाना काले जादू का उद्देश्य नहीं है। दरअसल ये तंत्र की एक विद्या है, जिसे भगवान् शिव ने अपने भक्तो को दिया था। पुराने समय में इसका प्रयोग सिर्फ दूर बैठे रोगी के उपचार के लिए किया जाता था। पुतले पर रोगी के बाल बाँध कर विशेष मंत्रो से उसे जागृत किया जाता था। इसके उपरांत रोगी के जिस भी अंग में समस्या होती थी, पुतले के उसी स्थान में सुई डाल कर, सकारात्मक ऊर्जा को उसके पास तक पहुंचाया जाता था। कुछ समय तक ऐसा करने पर तकलीफ से निदान मिल जाता था।

काला जादू

कब हुआ गलत कामो में उपयोग ?

कुछ स्वार्थी लोगो ने, इस विद्या का उपयोग समाज में गलत कार्यो के लिए इस्तेमाल किया। तभी से इसे काला जादू भी सम्बोधित किया जाने लगा। गौरतलब है की जिस प्रकार आप सकारत्मक ऊर्जा का निर्माण कर रोग दूर कर सकते है, ठीक उसी प्रकार नकारात्मक ऊर्जा का सञ्चालन कर आप व्यक्ति विशेष को नकारात्मक ढंग से भी प्रभावित कर सकते है।

काले जादू से निवारण के उपाय :

पीली हल्दी के चूर्ण को गंगा जल में घोल ले और पान के पत्ते के माध्यम से घर के सभी कोनो में उसे छिड़के। यह प्रक्रिया आपको शुक्ल पछ के रविवार को करनी है।

वशीकरण मंत्र :

एक सफेद कागज पर उस व्यक्ति और उसके उसके माता-पिता का नाम लिखें, जिसे आप वशीभूत करने के प्रयास में है ।अपने समछ घी का दीपक प्रज्जवलित करे और बाएं हाथ में चावल का दाना लेंकर नीचे दिए गए मंत्र का उच्चारण का 21 बार करें।

मंत्र – ऊँ हूं ही, ऊँ हो ही हा नमः!!

इस सम्पूर्ण प्रक्रिया के उपरान्त चावल को कागज सहित गंगाजल के साथ किसी शीशी में बंद कर, शमशान घाट में पेड़ के नीचे मिट्टी में दबा दे।
इसका प्रभाव बहुत ही कम समय में आपको प्रदर्शित होने लगेगा।
परन्तु इसका प्रयोग कभी भी बदले की भावना से नहीं किया जाना चाहिए।

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