शिवाजी महाराज क्यों समस्त भारतवर्ष का अभिमान हैं, जानें

शिवाजी महाराज क्यों समस्त भारतवर्ष का अभिमान हैं, जानें

शिवाजी

हमारा भारतवर्ष प्राचीन काल से ही वीर पुरुषों एवं वीर राजा शासकों की पृष्ठभूमि रहा है। हमारे भारतवर्ष के इतिहास में न जाने कितने ऐसे वीर पुरुषों का नाम दर्ज है जिन्होंने अपनी मातृभूमि एवं स्वराज की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति तक दे दी है। आज हम आपको ऐसे ही एक महान योद्धा और वीर पुरुष शिवाजी महाराज के जीवन परिचय एवं उनके इतिहास के बारे में बताने वाले हैं। यह एक ऐसे वीर पुरुष थे , जिन्होंने पूरे भारतवर्ष में मराठा साम्राज्य की नींव रखी थी। शिवाजी महाराज के जीवन से यह पता चलता है , कि उन्होंने अपने पूरे जीवन काल में लगभग कई सालों तक मुगलों से युद्ध किया था। वह अपने स्वराज प्रेम के प्रति सदैव सहज रहे थे। चलिए जानते हैं , इस महापुरुष के पूरे जीवन परिचय एवं इतिहास के बारे में।

◆शिवाजी महाराज का परिचय

शिवजी महाराज का पूरा नाम शिवाजीराजे शहाजीराजे भोसले है। शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को भारत देश के राज्य महाराष्ट्र में पुणे जिले में स्थित शिवनेरी नाम के किले में हुआ था।

शिवाजि महाराज का राज्याभिषेक 6 जून 1674 को हुआ था। शिवजी महाराज का पश्चिम महाराष्ट्र में कोंकण, सह्याद्री पहाड़ियों से लेकर नागपुर तक और खानदेश से लेकर उत्तर महाराष्ट्र दक्षिण भारत में तंजावर तक का इलाका उनके हाथ में था। शिवजी महाराज ने 6 जून 1674 से लेकर 3 अप्रैल 1680 तक राज किया था।

उस समय शिवाजी महाराज के जमाने में रायगड़ किले को पुरे महाराष्ट्र की राजधानी बना दिया गया था। शिवाजी महाराज के दो बेटे थे। उनका नाम संभाजी और दूसरे का नाम राजाराम है। शिवाजी महाराज के पिता का नाम शहाजीराजे भोसले है और उनके माँ का नाम जीजाबाई है। शिवजी महाराज की मृत्यु 3 अप्रैल 1680 को रायगढ़ किल्ले में हुई थी।

◆शिवाजी: समर्पित हिन्दू व सहिष्णु

शिवाजी महाराज एक समर्पित हिन्दू होने के साथ-ही-साथ धार्मिक सहिष्णु भी थे। उनके साम्राज्य में मुसलमानों को पूरी तरह से धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। कई मस्जिदों के निर्माण के लिए शिवाजी ने अनुदान दिया। उनके मराठा साम्राज्य में हिन्दू पण्डितों की तरह मुसलमान सन्तों और फ़कीरों को भी पूरा सम्मान प्राप्त था। उनकी सेना में मुसलमान सैनिक भी थे। शिवाजी हिन्दू संस्कृति को बढ़ावा देते थे। पारम्परिक हिन्दू मूल्यों तथा शिक्षा पर बल दिया जाता था। वह अपने अभियानों का आरंभ भी अकसर दशहरा के अवसर पर करते थे।

◆बचपन में खेल-खेल मे सीखा किला जीतना।

बचपन में शिवाजी अपनी आयु के बालक इकट्ठे कर उनके नेता बनकर युद्ध करने और किले जीतने का खेल खेला करते थे। युवावस्था में आते ही उनका खेल वास्तविक कर्म शत्रु बनकर शत्रुओं पर आक्रमण कर उनके किले आदि भी जीतने लगे। जैसे ही शिवाजी ने पुरंदर और तोरण जैसे किलों पर अपना अधिकार जमाया, वैसे ही उनके नाम और कर्म की सारे दक्षिण में धूम मच गई, यह खबर आग की तरह आगरा और दिल्ली तक जा पहुंची। अत्याचारी किस्म के तुर्क, यवन और उनके सहायक सभी शासक उनका नाम सुनकर ही डर के मारे चिंतित होने लगे थे।

◆शिवाजी महाराज का संस्कृत के लिए महत्वपूर्ण योगदान

शिवाजी एवं उनके परिवार में सभी लोगों को संस्कृत का बहुत ही अच्छा ज्ञान था। इसीलिए शिवाजी महाराज ने संस्कृत भाषा को बहुत ही बढ़ावा प्रदान किया था। शिवाजी महाराज के राजपुरोहित केशव पंडित एक संस्कृत के कवि तथा बहुत बड़े शास्त्री भी थे। शिवाजी महाराज ने अपने सभी शासकीय कार्य को संस्कृत एवं मराठी भाषा में प्रयोग करने के लिए बढ़ावा दिया।

छत्रपती शिवाजी महाराज ने स्वभाषा के रक्षण के लिये राज्य व्यवहार शब्दकोश बनाया।

इतिहासाचार्य वि. का . राजवाडे के अनुसार 1628 मे खत लिखने मे मराठी शब्दों का प्रमाण 14% था शिवाजी महाराज के प्रोत्साहन से वो 1677 मे 62 % हुआ।

◆छत्रपति शिवाजी के साहस एवं न्यायप्रियता की कहानी

एक बार की बात है। शिवाजी के समक्ष उनके सैनिक किसी गांव के मुखिया को पकड़ कर लाए। मुखिया बड़ी और घनी-घनी मूछों वाला बड़ा ही रसूखदार व्यक्ति था। लेकिन आज उस पर एक विधवा की इज्जत लूटने का आरोप साबित हो चुका था।

यह वाकया उस समय का है, जब वह मात्र चौदह साल के थे। शिवाजी बड़े ही बहादुर, निडर और न्यायप्रिय थे और खास तौर पर उनके मन में महिलाओं के प्रति असीम सम्मान था।

उन्होंने तत्काल अपना निर्णय सुनाया और कहा- ‘इसके दोनों हाथ और पैर काट दो,’ ऐसे जघन्य अपराध के लिए इससे कम कोई सजा नहीं हो सकती।

छत्रपति शिवाजी महाराज जीवनपर्यंत साहसिक कार्य करते रहे और हमेशा गरीब, बेसहारा लोगों को प्रेम और सम्मान देते रहें।

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