मंगल ग्रह कैसे वैवाहिक सुख में दोष उत्पन्न करता है? यहां जानिये

मंगल ग्रह का अस्तित्व –

सौर माला में पृथ्वी की कक्षा के बाहर यह प्रथम ग्रह हैं| इसका आकार पृथ्वी से छोटा हे|इसे भूमिपुत्र, लाल ग्रह , सेनानायक इत्यादी नामो से भी जाना जाता है| यह अग्नितत्व से बना हुंआ हैं| ज्योतिष शास्त्र में व्यक्ती का आत्मविश्वास और धाडस इसी ग्रह के दशा से देखा जाता है|बहुत ही निश्र्चयी , क्रोध युक्त, व चंचल ऐसा इसका स्वभाव हैं|हर बार खुदका ही सत्य करने वाला यह ग्रह हैं| व्यक्ती के चैतन्य पर यही ग्रह शासन करता हैं|मनुष्य के बल और वीर्य पर भी इसका ही प्रभुत्व देखने को मिलता हैं|अति आत्मविश्वास, दुसरों का न सुनने की प्रवृत्ती और इच्छा स्वरुप सुख पाने की वासना मंगल ग्रह की वजह से ही मनुष्य में उत्पन्न होती हैं|

मंगल ग्रह की प्राचीनता-

मंगल ग्रह के दोष और उन से उत्पन्न होने वाले परिणाम अनिष्ट हैं| इनका उल्लेख मूल ग्रंथ “मुहूर्त चिंतामणी” इस के ‘पीयुष धारा’ टिप्पणी में मिलता हैं| इस ग्रंथ में विवाह प्रकरण श्लोक ७ के उपर् पीयुष धारा टिप्पणी में कहा गया है | “इति अन्यमपि श्र्लोकं पठंति |लग्ने व्यये च पाताले आमित्र चाष्टमे कुजे|कन्या भरतृविनाशाय भर्ता कन्याविनाशदः”| इस श्लोक से यह निष्पन्न होता है |की पीयुषधारा की टिप्पणी से पुर्व भी यह श्लोक प्रचलित था|

“मुहूर्त चिंतामणी” यह ग्रंथ शके १५२२ में हुआ| और ग्रंथ के उपर की “पीयुष धारा” टिप्पणी १५२५ में की गयी है| मतलब यह पता चलता हैं की , इससे पूर्व भी विवाह के दौरान मंगल के दोष का अध्ययन किया जाता था |

वैवाहिक जीवन में महत्त्व-

विवाह कार्य में वधु- वर के गुण मिलाते हैं| उस समय जिसप्रकार नाडी कुट, गण इत्यादी आठ बातो से आने वाले गुण मिलाये जाते है | उसी तरह से मंगल के दोषों का भी बारिकी से अध्ययन किया जाता है|

सर्व साधारणतः जन्म कुंडली में १,४,७,८,१२ मतलब विवाह,सुख,सप्तम,मृत्यू व व्यय| इन में से किसी भी स्थान पर यह ग्रह होने से उसे दोषयुक्त माना जाता है|इन स्थानो पर अगर वधु की कुंडली में यह हो तो वैधव्य सुचक माना जाता है| और यदी वर की कुंडली में इन स्थानो पर हो तो स्त्री सुख और कौटुंबिक सुख नष्ट करता हैं|

देखा जाए तो, इसके जैसे ही दुसरे पापग्रह भी वैधव्य , स्त्रीसुखनाश इत्यादी अनिष्ट फल देते हैं| परंतु सिर्फ मंगल ग्रह ही ध्यान में लिया जाता है| शास्त्रो के नुसार , शुद्ध मार्ग मतलब वधु – वर की जन्म कुंडली ओं का योग्य अध्ययन तज्ज्ञ ज्योतिष से कर लेना चाहिए | और सभी अनिष्ट फलों का विचार किया जाना चाहिए|

अब यहा सिर्फ १,४,७,८,१२ इन पांच ही स्थानो का क्यूँ विचार किया गया होगा? इसे अगर ध्यान पुर्वक देखे तो यह पता चलता हैं |

प्रथम –

प्रथम स्थान विवाह स्थान हैं| उसका व्यक्तिमत्व पर ज्यादा प्रभाव पडता हैं|और इस स्थान के मंगल की दृष्टी सीधा वैवाहिक सौख्य स्थान पर आती हैं|

चतुर्थ –

चतुर्थ स्थान सुख हैं|सुख स्थान में मंगल ग्रह मातृसौख्य,कुटुंब सौख्य को मारक ठरता हैं |

सप्तम् –

सप्तम स्थान तो वैवाहिक सुख का हैं| यह सीधा वैवाहिक जीवन पर मारक ठरता हैं और वैवाहिक सुख को हानी पोहचाता हैं|

अष्टम् –

अष्टम् स्थान मृत्यू स्थान माना जाता है|इस लिये इस स्थान का मंगल वैवाहिक जीवन सुख की कालमर्यादा कम करने में कारण बनता है|

द्वादश –

यह शय्या सुख स्थान हैं| इस कारण यह मंगल शैय्यासुख को हानी पोहचाता हैं|

तो इस तरह से हमने मंगल के दोषों के लिए कारणीभूत सभी भावों की जानकारी ले ली हैं|

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