Nag Panchami 2026: नाग पंचमी पर तीन शुभ योग, एक ही दिन पाएं नाग देवता, शिवजी और सूर्य देव का आशीर्वाद

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Nag Panchami 2026: सावन मास की नाग पंचमी धार्मिक दृष्टि से बहुत ही खास मानी जाती है। यह दिन नाग देवता की पूजा के लिए समर्पित होता है। लेकिन इस वर्ष नाग पंचमी पर बेहद दुर्लभ योग बन रहा है, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ जाएगा। आइए जानते हैं कि सावन में कब मनाया जाएगा नाग पंचमी का पावन पर्व और इस दिन कौन से शुभ योग बन रहे हैं।

नाग पंचमी पर दुर्लभ संयोग

धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से नाग पंचमी की तिथि इस वर्ष बेहद महत्वपूर्ण रहेगी। क्योंकि इस दिन एक नहीं बल्कि तीन दुर्लभ संयोग बन रहे हैं। आइए जानते हैं विस्तार से-

नाग पंचमी कब है

सावन (श्रावण) मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। पंचमी तिथि 16 अगस्त को शाम 6 बजकर 47 मिनट से लग जाएगी और 17 अगस्त को शाम 6 बजकर 49 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि के मुताबिक इस साल सोमवार, 17 अगस्त 2026 को नाग पंचमी मनाया जाएगा।

सावन का तीसरा सोमवार

सावन में पड़ने वाले सोमवार के दिन का खास महत्व होता है। इस दिन शिवभक्त व्रत रखते हैं, जिसे सावन सोमवारी कहा जाता है। इस वर्ष नाग पंचमी के दिन ही सावन मास का तीसरा सोमवार भी रहेगा, जिस कारण इस तिथि को काफी दुर्लभ माना जा रहा है। सावन सोमवार पर नाग पंचमी का संयोग बनना अभीष्ट सिद्धि यानी मनोकामना पूर्ति करने वाला माना जाता है।

सूर्य गोचर (सूर्य संक्रांति)

ग्रहों के राजा सूर्य हर महीने राशि बदलते हैं, जिसे सूर्य का राशि परिवर्तन या गोचर कहा जाता है। नाग पंचमी के दिन ही 17 अगस्त को सूर्य अपनी स्वराशि सिंह में गोचर कर रहे हैं, जिसे अत्यंत शुभ माना जा रहा है। सूर्य जिस दिन जिस राशि में गोचर करते हैं, उसे संक्रांति के नाम से जाना जाता है। इसलिए 17 अगस्त को सिंह संक्रांति भी मनाई जाएगी। बता दें कि, 17 अगस्त को रात 10 बजकर 21 मिनट पर सूर्य सिंह राशि में आ जाएंगे।  

नाग पंचमी पर बनेंगे ये शुभ योग

17 अगस्त को सुबह 5 बजकर 51 मिनट से सुबह 8 बजकर 4 मिनट तक रवि योग रहेगा। नाग पंचमी के दिन सुबह से ही शुभ योग रहेगा जो अगले दिन यानी 18 अगस्त तड़के 3 बजकर 29 मिनट तक रहेगा। एस्ट्रोटॉक के पंचांग के अनुसार, 17 अगस्त को रात 8 बजकर 55 मिनट पर शनि और बुध एक दूसरे से 120 डिग्री पर होंगे, जिससे नवपंचम राजयोग बनेगा।

नाग पंचमी 2026 शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 24 मिनट से 5 बजकर 8 मिनट
अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 59 मिनट से दोपहर 12 बजकर 51 मिनट
विजय मुहूर्त शाम 4 बजकर 17 मिनट से 5 बजकर 14 मिनट
अमृत काल मुहूर्त शाम 6 बजकर 46 मिनट से रात 8 बजकर 27 मिनट
निशिता मुहूर्त रात 12 बजकर 3 मिनट से 12 बजकर 47 मिनट

इस वर्ष के सारे शुभ मुहूर्त पढ़ें।

नाग पंचमी पूजा विधि

  • नाग पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहन लें।  इस दिन सावन सोमवार है। इसलिए सबसे पहले भगवान शिव की पूजा करें और फिर नाग देवता की पूजा की तैयारी करें।
  • नाग पंचमी की पूजा घर या मंदिर कहीं भी कर सकते हैं। नाग पंचमी की पूजा 12 नागों वाले चित्र में होती है। सबसे पहले लकड़ी के पाटे में चित्र स्थापित करें। अगर चित्र नहीं है तो दीवार पर आकृति बनाकर या मिट्टी से प्रतिमा बनाकर भी पूजा कर सकते हैं।
  • सबसे पहले नाग देवताओं को चंदन का तिलक लगाएं, सुगंधित फूल और इत्र अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप जलाएं। भोग स्वरूप मीठा दूध, गुड़ और लावा चढ़ाएं। 
  • इसके बाद नाग मंत्र ‘प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथ्वीतले. ये च हेलिमरीचिस्था येऽन्तरे दिवि संस्थिताः. ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिनः. ये च वापीतडगेषु तेषु सर्वेषु वै नमः’ का जाप करें।

नाग पंचमी पूजा का धार्मिक महत्व

सावन मास में नाग पंचमी की पूजा का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि, नाग देवता की पूजा करने से परिवार की रक्षा होती है। ज्योतिष के अनुसार नाग पंचमी पर नाग देवताओं की पूजा से कुंडली में काल सर्प दोष से मुक्ति मिलती है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है।

नाग पंचमी मनाने की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार,प्राचीन समय में हस्तिनापुर में राजा परीक्षित का राज खा। एक बार वे शिकार के लिए जंगल गए थे और रास्ता भटक गए। राजा को बहुत प्यास लगी थी, तब उन्हें दूर में एक आश्रम नजर आया। राजा ने आश्रम जाकर पानी मांगा। आश्रम में ऋषि श्रमिक ध्यान में लीन थे, इसलिए उन्होंने राजा की बात सुनकर भी अपना ध्यान भंग नहीं किया। राजा परीक्षित को ऋषि पर क्रोध आ गया। राजा ने एक मरा हुआ सांप ऋषि के गले में डाल दिया और वहां से चला गया।

थोड़ी देर बाद जब ऋषि के पुत्र श्रृंगी आश्रम आए तो उन्होंने पिता के गले में मरा हुआ सांप देखकर राजा परीक्षित को श्राप दे दिया कि, आज से सातवें दिन तक्षक नाग के डसने से राजा परीक्षित की मृत्यु हो जाएगी। राजा को इसका पता तो वे चिंतित हो गए। राजा श्राप से बचने के उपाय ढूंढने लगा। अंतत: सातवें दिन तक्षक नाग ने एक ब्राह्मण का रूप धारण कर राजा डस लिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई।

पिता की मृत्यु से दुखी होकर राजा के पुत्र जन्मेजय ने प्रण लिया कि वह समस्त नागों का नाश कर देंगे। इसके लिए उन्होंने एक विशाल सर्पसत्र यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के मंत्रोचारण में  नाग स्वयं आकर एक-एक कर अग्निकुंड में गिरने लगे। यह देख तक्षक नाग भयभीत होकर देवराज इंद्र के पास पहुंचे। यज्ञ की आहुति में जब तक्षक भी खिंचने लगे तो उसके साथ इंद्र भी खिंचते हुए आने लगे, यह देख देवता चिंतित हो गए और ब्रह्म देव के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने यज्ञ रोकने के लिए आस्तिक मुनि को बुलाया।

आस्तिक मुनि ने समझाया कि हर प्राणी का अपना धर्म और अपना स्थान होता है। बिना कारण सर्पों के मारे जाने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ने का खतरा है। उन्होंने जन्मेजय से कहा कि, आपके पिता की मृत्यु उनके कर्मों के कारण हुई ना कि तक्षक नाग के कारण, इसलिए तुंरत इस यज्ञ को रोक दें। इसके बाद जन्मेजय ने यज्ञ रोक दिया और नागों से क्षमा मांगकर उनकी पूजा की। उस दिन सावन महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी। मान्यता है कि इस दिन से ही सावन में नाग पंचमी पर नागों की पूजा की शुरुआत हुई

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Posted On - August 14, 2026 | Posted By - Admin | Read By -

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