जानें आपके जीवन पर मंगल का प्रभाव और अशुभ मंगल के उपाय

Posted On - June 13, 2020 | Posted By - Om Kshitij Rai | Read By -

 718 

मंगल

मंगल ग्रह का ज्योतिष में अलग ही महत्व है। इस मंगल को मेष और वृश्चिक राशियों का स्वामी और पराक्रम व ऊर्जा का कारक माना जाता है। इसलिए इस ग्रह के जातक तेज व पराक्रमी होते हैं। ज्योतिष की माने तो मंगल कुंडली में किस भाव में विराजमान हैं उनका प्रभाव उसी तरह से जातक पर पड़ता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली में मंगल ग्रह का सही स्थिति में न होना जैसे पहले, चौथे, सातवें व बारहवें में भाव में विराजने पर कुंडली में मांगलिक दोष का निर्माण होता है। इसी दोष के कारण जातक के विवाह में देरी होती है। माना जाता है कि मांगलिक को मांगलिक के साथ ही विवाह करना चाहिए। ऐसा न होने से वर वधु के जीवन में परेशानियां आती है। वैवाहिक जीवन सुखमय नहीं होता है। इसलिए ज्योतिष व पंडित मंगल दोष निवारण करवाने की सलाह देते हैं।

◆ पौराणिक कथा: कैसे हुआ मंगल का जन्म?

मंगल ग्रह की उत्पत्ति का एक पौराणिक वृत्तांत स्कंदपुराण के अवंतिका खण्ड में मिलता है। एक समय उज्जयिनी पुरी में अंधक नाम से प्रसिद्ध दैत्य राज्य करता था। उसके महापराक्रमी पुत्र का नाम कनक दानव था। एक बार उस महाशक्तिशाली वीर ने युद्ध के लिए इन्द्र को ललकारा तब इन्द्र ने क्रोधपूर्वक उसके साथ युद्ध कर उसे मार गिराया। उस दानव को मारकर वे अंधकासुर के भय से भगवान शंकर को ढूंढते हुए कैलाश पर्वत पर चले गए।

इन्द्र ने भगवान आशुतोष के दर्शन कर अपनी अवस्था उन्हें बताई और रक्षा की प्रार्थना की, भगवन ! मुझे अंधकासुर से अभय वरदान दीजिए। इन्द्र का वचन सुनकर शरणागत वत्सल शिव जी ने इंद्र को अभय वरदान दिया और अंधकासुर को युद्ध के लिए ललकारा, युद्ध अत्यंत घमासान हुआ, और उस समय लड़ते-लड़ते भगवान शिव के मस्तक से पसीने की एक बूंद पृथ्वी पर गिरी, उससे अंगार के समान लाल अंग वाले भूमिपुत्र मंगल का जन्म हुआ। अंगारक, रक्ताक्ष तथा महादेव पुत्र, इन नामों से स्तुति कर ब्राह्मणों ने उन्हें ग्रहों के मध्य प्रतिष्ठित किया, तत्पश्चात उसी स्थान पर ब्रह्मा जी ने मंगलेश्वर नामक उत्तम शिवलिंग की स्थापना की। वर्तमान में यह स्थान मंगलनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है, जो उज्जैन में स्थित है।

◆वैदिक ज्योतिषी में मंगल का महत्व

भारतीय वैदिक ज्योतिष में मंगल ग्रह को मुख्य तौर पर ताकत और मर्दानगी का कारक माना जाता है। यह ग्रह प्रत्येक व्यक्ति में शारीरिक ताकत तथा मानसिक शक्ति एवं मजबूती का प्रतिनिधित्व करते हैं। मानसिक शक्ति का अभिप्राय यहां पर निर्णय लेने की क्षमता और उस निर्णय पर टिके रहने की क्षमता से है।

इस ग्रह के प्रबल प्रभाव वाले जातक आम तौर पर तथ्यों के आधार पर उचित निर्णय लेने में तथा उस निर्णय को व्यवहारिक रूप देने में भली प्रकार से सक्षम होते हैं। ऐसे जातक सामान्यतया किसी भी प्रकार के दबाव के आगे घुटने नहीं टेकते तथा इनके उपर दबाव डालकर अपनी बात मनवा लेना बहुत कठिन होता है और इन्हें दबाव की अपेक्षा तर्क देकर समझा लेना ही उचित होता है।

◆शुभ-अशुभ प्रभाव

यदि यह ग्रह किसी जातक की कुंडली में शुभ हो तो उस जातक के साहस, शौर्य, पराक्रम में वृद्धि होती है। वह जमीन से जुड़े मामलों में विजयी होता है। शत्रु पक्ष उसके सामने घुटने टेकने पर मजबूर हो जाता है। किंतु यदि मंगल कुंडली में अशुभ स्थिति में बैठा हो तो ठीक इसके विपरीत परिणाम जातक को प्राप्त होते हैं। इस ग्रह के ही कारण कुंडली में मंगल दोष बनता है।

◆क्या होता है मंगल दोष?

मंगल ग्रह जब कुंडली के पहले, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में स्थित होता है तो इस स्थिति में मंगल दोष बनता है। इस ग्रह की यह स्थिति दांपत्य जीवन के लिए अशुभ होती है। हालांकि यदि लाल ग्रह पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि पड़ती है तो मंगल दोष का प्रभाव कुछ कमज़ोर हो जाता है।

◆अशुभ मंगल से बचने के अचूक उपाय।

(1) लाल कपड़े में सौंफ बांधकर अपने शयनकक्ष में रखें।

(2) लाल ग्रह प्रभावित व्यक्ति अपने घर में लाल पत्थर अवश्य लगवाएं।

(3) प्रियजनों को मिष्ठान्न का सेवन कराने से भी यह ग्रह शुभ बनता है।

(4) लाल वस्त्र में दो मुठ्ठी मसूर की दाल बांधकर मंगलवार के दिन किसी भिखारी को दान करें।

(5) मंगलवार के दिन हनुमानजी के चरण से सिन्दूर लेकर उसका टीका माथे पर लगाना चाहिए।

यह भी पढ़ें- असभ्य वाणी या गाली से ग्रह लाते हैं जीवन में दुष्प्रभाव, जानिए कैसे

 719 

Our Astrologers

1500+ Best Astrologers from India for Online Consultation