जन्माष्टमी का त्योहार भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यतानुसार, द्वापर युग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था। इसलिए हर साल इसी तिथि पर धूमधाम से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। इस वर्ष की जन्माष्टमी धार्मिक दृष्टि से बहुत ही खास रहने वाली है, क्योंकि इस बार लड्डू गोपाल के जन्मोत्सव पर कई शुभ योग का संयोग बन रहा है। आइए जानते हैं किस दिन मनाई जाएगी जन्माष्टमी, इस दिन कौन से योग बनेंगे और पूजा का शुभ मुहूर्त क्या रहेगा?
पंचांग के अनुसार, जन्माष्टमी का पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष 4 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 29 मिनट से रोहिणी नक्षत्र शुरू हो जाएगी और रात 11 बजकर 4 मिनट तक रोहिणी नक्षत्र समाप्त हो जाएगी। शुक्रवार 4 सितंबर 2026 को जन्माष्टमी रोहिणी नक्षत्र अष्टमी तिथि के संयोग में मनेगी। पुराणों में ऐसे योग में व्रत-पूजन करने को पूर्व जन्मों का पुण्यफल माना जाता है। वहीं निर्णय सिंधु के अनुसार, रोहिणी युक्त अष्टमी तिथि में जन्माष्टमी का व्रत करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है। जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांडी का उत्सव और छठे दिन लड्डू गोपाल की छठी मनाई जाएगी।
इस साल जन्माष्टमी 2026 पर शुभ योगों की झड़ी लगने वाली है। 4 सितंबर को हंस योग, मालव्य राजयोग, बुधादित्य राजयोग, हर्ष योग का संयोग बन रहा है। इसके अलावा रोहिणी नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग भी रहेगा। इन योगों में किए व्रत-पूजन का फल कई गुना बढ़ जाएगा।
जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल की पूजा के लिए आधी रात का समय सबसे शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यतानुसार, कान्हा का जन्म रोहिणी नक्षत्र में आधी रात के समय हुआ था। जन्माष्टमी पर पूजा के लिए 4 सितंबर की रात 11 बजकर 57 मिनट से 12 बजकर 43 मिनट तक का समय रहेगा। भक्तों को पूजा के लिए सिर्फ 46 मिनट का समय मिलेगा।
जन्माष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि करें और फिर व्रत का संकल्प लें। पूरे दिन उपवास रहकर भगवान का स्मरण, भजन या मंत्र जाप करें। रात में पूजा की तैयारी करें। पूजा स्थल या किसी शुद्ध स्थान पर चौकी स्थापित करें और पीले रंग का कपड़ा बिछाएं। जन्माष्टमी पर झूला जरूर सजाएं। निशीथ काल में पंचामृत से कान्हा का अभिषेक करें। इसके बाद नए वस्त्र और आभूषण पहनाएं और श्रृंगार करें। कान्हा को चंदन का तिलक लगाएं और माथे पर मोर मुकुट पहनाएं। रोली, तुलसी, फूल, फल अर्पित कर माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी और अन्य सात्विक भोग लगाएं। इसके बाद लड्डू गोपाल को झूले पर बिठाकर झूला झुलाएं और फिर आरती करें।
कई लोगों को लगता है कि, भगवान कृष्ण का जन्म रात 12 बजे हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी व्रत का पारण रात 12 बजे के बाद किया जा सकता है। लेकिन दिनभर व्रत रखने के बाद आप ऐसी भूल न करें। रात में श्रीकृष्ण की विधि-विधान से पूजा करने के बाद चरणामृत, प्रसाद या पंजीरी के व्रत का पारण कर सकते हैं। लेकिन अगले दिन सूर्योदय के बाद अन्न का सेवन करना शास्त्रसम्मत माना गया है। 5 सितंबर को सुबह 6 बजे के बाद आप स्नान और पूजा के बाद भोजन और अन्न आदि ग्रहण कर सकते हैं।
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