कुंडली के विभिन्न दोषों में ‘ग्रहण दोष’ भी एक है। ग्रहण दोष ऐसा दोष है जिसे लेकर लोगों के बीच जिज्ञासा और डर दोनों होता है। जैसे ही कुंडली में इस दोष का पता चलता है तो, लोग अपने निजी जीवन, करियर, शिक्षा, बिजनेस आदि पर इसके प्रतिकूल प्रभाव को लेकर थोड़ा चिंतित हो जाते हैं। लेकिन ग्रहण दोष से डरने के बजाय इसे विस्तृत रूप से जानने और समझने की जरूरत है।
वैदिक ज्योतिष में कुंडली दोष, मंगल दोष, नाड़ी दोष जैसे कई प्रकार के दोषों का जिक्र मिलता है। ग्रहण दोष जन्मकुंडली में सूर्य या चंद्रमा पर राहु-केतु जैसे छाया ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव से जुड़ा दोष माना जाता है। ज्योतिषीय मान्यतानुसार, जब किसी व्यक्ति का जन्म सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण के समय होता है तो, उसकी कुंडली में ग्रहण दोष बनता है। लेकिन यह जान लें कि, दोष चाहे जो भी है, इसका नकारात्मक प्रभाव स्थायी नहीं रहता, बल्कि कुछ समय बाद या कुछ विशेष उपायों के जरिए इसे दूर भी किया जा सकता है। इसलिए ग्रहण दोष को लेकर भयभीत होने से पहले वास्तविक अर्थ को समझना भी उतना ही जरूरी है। यहां जानें, ग्रहण दोष कैसे बनता है, इसके मुख्य लक्षण क्या हैं, जीवन में इसका क्या प्रभाव पड़ता है और इसका निवारण कैसे संभव है?
जब सूर्य या चंद्रमा एक निश्चित खगोलीय स्थिति में राहु या केतु के पास आते हैं, तब ग्रहण लगता है। ग्रहण की अवधि में सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश पृथ्वी पर अस्थायी रूप से छिप जाता है या सीमित हो जाता है। ठीक इसी तरह से कुंडली में जब राहु-केतु सूर्य या चंद्रमा के निकट होते हैं तब ग्रहण दोष बनता है। ज्योतिष शास्त्र में इसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील योग माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में राहु-केतु को छाया ग्रह की उपाधि प्राप्त है। सूर्य ग्रह को आत्मा, आत्मसम्मान, नेतृत्व क्षमता, पिता, उच्च पद आदि का कारक माना जाता है। वहीं चंद्रमा का मन, मस्तिष्क, शीतलता और भावनाओं से संबंध होता है।
ज्योतिषीय मान्यता है कि, राहु-केतु जैसे छाया ग्रह जब सूर्य या चंद्रमा को प्रभावित करते हैं, तब सूर्य और चंद्रमा की शक्ति कमजोर हो जाती है, जिस कारण वे अपना शुभ फल नहीं दे पाते हैं। लेकिन कुंडली में ग्रहण दोष होने का मतलब यह नहीं है कि, इससे सूर्य और चंद्रमा के सकारात्मक गुण पूरी तरह से खत्म हो जाएं। ग्रहण दोष का अर्थ यह है कि, इन ग्रहों से जुड़े शुभ फलों को पाने के लिए अधिक सचेत रहने और जरूरी उपाय करने की जरूरत हो सकती है।
जन्म कुंडली में जब सूर्य और चंद्रमा राहु या केतु के बहुत करीब होते हैं तब ग्रहण दोष निर्मित होता है। लेकिन ज्योतिषी चार मुख्य ग्रह संयोजनों के जरिए ग्रहण दोष की पहचान करते हैं। ग्रहण दोष के चार संभावित संयोजन इस प्रकार हैं-
1. सूर्य-राहु युति: जब सूर्य और राहु एक ही घर में हों तब कुंडली में सूर्य-राहु की युति बनती है। इसे पूर्ण सूर्य ग्रहण दोष या आदित्य चांडाल योग कहा जाता है।
2. सूर्य-केतु युति: कुंडली में जब सूर्य और केतु एक ही घर में हों तब सूर्य-केतु की युति होती है। इससे आंशिक ग्रहण दोष बनता है।
3. चंद्रमा-राहु युति: जब कुंडली में चंद्रमा और राहु एक ही घर में हों तब इस संयोजन से पूर्ण चंद्र ग्रहण दोष बनता है।
4. चंद्रमा-केतु युति: चंद्रमा और केतु जब एक ही घर में होते हैं तो इस संयोजन को आंशिक चंद्र ग्रहण दोष कहा जाता है।
जन्मकुंडली में यह दोष तब निर्मित होता है, जब राहु या केतु कुंडली के किसी भाव में सूर्य के साथ बैठे हों। इसके अलावा कई बार जब राहु केतु की तीव्र दृष्टि सूर्य पर पड़े, तब भी ग्रहण दोष को प्रभावी माना जाता है। जिनकी कुंडली में सूर्य ग्रहण दोष बनता है, वे आत्मविश्वास में कमी महसूस करते हैं।
इस दोष के प्रतिकूल प्रभाव के कारण मान-सम्मान पर असर पड़ता है, पिता के साथ संबंध तनावपूर्ण हो सकते हैं या निजी व सरकारी कार्यों में अड़चने आती हैं। इसके विपरीत सूर्य ग्रहण दोष व्यक्ति को अधिक महत्वाकांक्षा के अवसर दे सकता है। इस दोष के कारण लोग बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने, सफलता हासिल करने जैसे कार्यों के प्रति अधिक जुनूनी भी हो जाते हैं।
कुंडली में चंद्र ग्रहण दोष तब बनता है जब जन्म के समय चंद्रमा कुंडली के किसी भी भाव में राहु या केतु के साथ एक ही राशि में स्थित होता है। राहु-केतु जब चंद्रमा को प्रभावित करते हैं तब इससे व्यक्ति की भावनात्मक स्थिति अनियंत्रित हो सकती है। इस दोष के कारण लोग अधिक भावुक हो सकते हैं। हालांकि इस दोष को यदि सकारात्मक रूप से निर्देशित किया जाए तो यह रचनात्मकता और आत्म जागरुकता में वृद्धि भी कर सकता है।
कुंडली में ग्रहण दोष होने पर शिवजी की पूजा करना प्रभावी माना जाता है। शिवजी की पूजा से शांति, परिवर्तन और आंतरिक जागरूकता बढ़ती है। शिव पूजा से ग्रहण दोष से जुड़ी भावनात्मक उथल-पुथल, भ्रम और मानसिक तनाव में कमी आती है।
ग्रहण दोष होने पर ज्योतिषी महामृत्युंजय मंत्र, आदित्य हृदय स्तोत्र, चंद्र मंत्र 'ॐ सोम सोमाय नमः' और सूर्य मंत्र 'ॐ आदित्याय नमः' मंत्र का जाप करने की सलाह देते हैं।
ग्रहण दोष को कम करने के लिए सूर्य, चंद्रमा और राहु-केतु से संबंधित वस्तुओं का दान करना चाहिए। गरीब और जरूरतमंद में काला तिल, वस्त्र, चावल, दूध-दही, गेहूं, गुड़ आदि का दान कर सकते हैं।
कुंडली में दोष होने पर ज्योतिषी रत्न धारण करने की सलाह देते हैं। ग्रहण दोष के बुरे प्रभावों को कम करने में सहायक हो सकते हैं। लेकिन किसी भी रत्न को धारण करने से पहले विश्वसनीय ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें। कुंडली के आधार पर कौन सा रत्न आपके लिए शुभ रहेगा या अन्य सवालों के जवाब पाने के लिए ज्योतिषी के साथ फ्री चैट कर सकते हैं।
नहीं, ग्रहण दोष का मतलब यह नहीं है कि, जीवन हमेशा परेशानियों से भरा रहेगा। ग्रहों के संयोजन से अनुकूल और प्रतिकूल दोनों तरह के परिणाम मिल सकते हैं। कई सफल लोगों की कुंडली में भी ग्रहण दोष हो सकता है। ग्रहण दोष के साथ कुंडली में अगर सहायक योग हो तो यह लाभ भी दे सकता है। राहु ग्रह अगर भ्रम बढ़ाता है तो जीवन में नवाचार भी ला सकता है। इसी तरह, केतु वैराग्य और आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ाता है। इसलिए किसी दोष से घबराने या चिंतित होने के बजाय ग्रहों के संयोजन और उससे मिलने वाले सकारात्मक परिणाम को कैसे पाया जाए यह समझना ज्यादा जरूरी है।
इसका जवाब 'हां' या 'ना' में देना संभव नहीं है। ग्रहण दोष पूरी तरह समाप्त होगा या नहीं, यह व्यक्ति की कुंडली पर निर्भर करता है।
ग्रहण दोष के कारण सेहत समस्या, मानसिक तनाव, करियर-व्यापार में रुकावटें या पारिवारिक मन-मुटाव हो सकता है।
नहीं, लेकिन ज्योतिषी की सलाह से ग्रहण दोष में रत्न धारण करना सहायक उपाय हो सकता है।
मन, निर्णय, सेहत, परिवार और करियर पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है।