जीवन की गाड़ी सुख-दुख और सफलता-असफलता के पहियों पर चलती है। आपने देखा होगा कि कभी-कभी सब कुछ अच्छा होने लगता है और अगले ही पल सब बिगड़ भी जाता है। कुछ काम ऐसे होते हैं, जो बिना किसी कठिन प्रयास के पूरे हो जाते हैं, जबकि कुछ काम बिना बाधाओं के पूर्ण नहीं होते। ऐसी स्थिति में आपके मन में भी सवाल उठते होंगे कि आखिर ऐसा क्यों होता है? ज्योतिष शास्त्र में इसका उत्तर है 'महादशा'।
संभवत: महादशा को लेकर अब आपके मन में कई तरह के सवाल पैदा हो रहे होंगे कि, महादशा क्या है, यह कैसे काम करता है, महादशा कब शुभ होती है और कब अशुभ? Mahadasha in Hindi (महादशा) के बारे में जानने के लिए यहां विस्तार से पढ़ें।
महादशा समय का ऐसा चक्र है, जिससे जीवन की दशा और दिशा निर्धारित होती है। साधारण शब्दों में कहें तो महादशा जीवन का वह नक्शा है, जिससे यह पता चलता है कि, किस मोड़ पर चुनौतियां आएंगी और कब सफलता के मार्ग खुलेंगे। महादशा का नाम सुनते ही आमतौर पर लोगों को डर और घबराहट होने लगती है। लेकिन इससे डरने की नहीं, बल्कि इसे समझने की जरूरत है। क्योंकि महादशा का असली अर्थ जीवन यात्रा के उतार-चढ़ाव को समझने की कुंजी से है।
महादशा संस्कृत के दो शब्दों महा और दशा से मिलाकर बनी है। महा का अर्थ 'महान' से है और दशा का अर्थ 'समयावधि' से है। इस प्रकार महादशा का अर्थ ग्रहों की एक खास अवस्था है। विंशोत्तरी दशा प्रणाली में मनुष्य की आयु 120 वर्ष मानी जाती है और इस वर्ष को 9 ग्रहों के बीच अलग-अलग वर्षों में बांटा गया है। प्रत्येक ग्रह एक खास विषय और कर्मिक पाठ का प्रतिनिधित्व करता है। उदाहरण के लिए, मंगल महादशा साहस, बृहस्पति का आध्यात्म, शुक्र का प्रेम और शनि का अनुशासन पर केंद्रित है।
जन्मकुंडली में जब किसी ग्रह की महादशा शुरू होती है, तब वही ग्रह राजा बनकर जीवन पर शासन करने लगता है। इस अवधि में उसी ग्रह के प्रभाव से जीवन में कई तरह की प्रिय-अप्रिय घटनाएं होने लगती हैं। महादशा के दौरान कैसा फल मिलेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी कुंडली में वह ग्रह उच्च या नीच किस स्थिति में विराजमान है।
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दशा |
महादशा |
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दशा घड़ी की तरह है |
तो महादशा घंटे की सुई है |
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दशा व्यापक प्रणाली है |
महादशा उस प्रणाली के प्रमुख कालखंड के नाम है |
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किसी ग्रह का कुल प्रभाव या समयावधि |
लंबी या मुख्य समयावधि (6 से 20 साल तक हो सकती है) |
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दशा यह बताती है कि जीवन में कब कौन सा ग्रह सक्रिय रहेगा |
यह जीवन के उस दौर की मुख्य दिशा तय करती है |
कुल 9 प्रकार की महादशाएँ होती हैं जो कुछ समय तक रहती हैं।
ग्रहों की महादशा का संपूर्ण चक्र 120 वर्ष
महादशा नौ ग्रहों द्वारा शासित एक ऐसी अवधि है जो हर व्यक्ति के जीवन में जरूर आती है। लेकिन हर व्यक्ति पर महादशा का असर एक जैसा हो, यह जरूरी नहीं है। महादशा का असर आपके जीवन पर शुभ होगा या अशुभ यह पूरी तरह से कुंडली में ग्रह की स्थिति पर निर्भर करता है। विस्तार से जानते हैं कि किस ग्रह की महादशा का जीवन पर कैसा प्रभाव पड़ता है।
कुंडली में सूर्य की महादशा 6 साल तक रहती है। ज्योतिष में सूर्य को पिता, आत्मा, ऊर्जा, नेतृत्व और आत्मविश्वास का कारक माना गया है। सूर्य की महादशा के शुभ प्रभाव से व्यक्ति के मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। सरकारी नौकरी या पदोन्नति मिलती है और आत्मविश्वास बढ़ता है। लेकिन सूर्य की महादशा के अशुभ प्रभाव से पिता से अनबन, सेहत संबंधी परेशानी (विशेषकर आंख और हृदय) और अहंकार में वृद्धि होती है।
चंद्रमा महादशा की अवधि 10 वर्ष की होती है। ज्योतिष में चंद्रमा को मन, गहन भावनाएं और आंतरिक परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है। चंद्रमा के प्रभाव में व्यक्ति अधिक संवेदनशील, सहज और परिवार-उन्मुख हो सकते हैं। कुंडली में अगर चंद्रमा की स्थिति मजबूत हो तो महादशा के समय भी व्यक्ति को मानसिक शांति मिलती है, रचनात्मक कार्यों की रूझान बढ़ता है और ललित कलाओं में रुचि बढ़ती है। वहीं चंद्रमा के कमजोर होने पर महादशा के समय मानसिक तनाव और डिप्रेशन बढ़ता है।
शक्ति, पराक्रम, साहस और प्रतिस्पर्धी ग्रह मंगल की महादशा कुंडली में 7 वर्ष तक रहती है। कुंडली में मंगल प्रबल हो तो महादशा की स्थिति में भी निडर बनाता है और भूमि-भवन का लाभ दिला सकता है। इस समय पुलिस, सेना या खेलकूद जैसे क्षेत्रों में सफलता मिलने के अवसर प्राप्त होते हैं। वहीं अशुभ या कमजोर मंगल के कारण दुर्घटना, चोट, कोध और रक्त-संबंधी विकार बढ़ सकते हैं।
राहु की 18 साल की महादशा तीव्र, अप्रत्याशित और जीवन में बदलाव लाने वाली होती है। छाया ग्रह राहु की सकारात्मक स्थिति महत्वाकांक्षा, यश, करियर में सफलता और शत्रुओं पर विजय दिलाता है। वहीं अशुभ प्रभाव में मतिभ्रम, जेल, सट्टेबाजी, लाइलाज बीमारी और बुरी लतों का शिकार हो सकते हैं।
ज्ञान और विस्तार के ग्रह गुरु (बृहस्पति) की महादशा 16 वर्ष की होती है। कुंडली में गुरु मजबूत हो तो करियर में विकास, अंतर्मन की शक्ति, आर्थिक विकास, सामाजिक प्रतिष्ठा और संतान का सुख मिलता है। वहीं कमजोर गुरु के कारण अहंकार, आर्थिक तंगी और स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
शनि को क्रूर और दंड देने वाला ग्रह माना जाता है। इसलिए शनि की महादशा का नाम सुनते ही लोग डर जाते हैं। लेकिन कई बार शनि की यह अवस्था सफलता, परिपक्वता और अनुशासन दिलाती है, बशर्ते कुंडली में शनि की स्थिति अनुकूल हो। शनि मजबूत हो तो महादशा के दौरान भी लोहा, तेल या मशीनरी के बिजनेस में सफलता मिलती है। वहीं कमजोर शनि कार्यों में विलंब, घुटनों और हड्डियों में दर्द, गरीबी और अकेलापन बढ़ा सकते हैं।
बुद्धि, वाणी, व्यापार के कारक बुध की महादशा कुंडली में 17 वर्ष तक रहती है। बुध महादशा की अवधि व्यक्ति को जिज्ञासु बनाती है जो संचार, लेखन, व्यवसाय और शिक्षा क्षेत्र के लिए अनुकूल साबित हो सकती है। वहीं बुध अगर पीड़ित हो तो गलत निर्णय लेने की प्रवृत्ति, चिंतन, भ्रम और वाणी दोष बढ़ते हैं।
ज्योतिष शास्त्र में छाया ग्रह केतु को मोक्ष और विरक्ति का कारक माना गया है। कुंडली में केतु की महादशा 7 वर्ष की होती है। केतु प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि, भौतिक सुख और सफलता जैसी चीजों से लगाव दूर करता है। लेकिन केतु अनुकूल हो तो अध्यात्म और मोक्ष की ओर झुकाव बढ़ता है। लेकिन अगर केतु अशुभ हो, तो भावनात्मक अलगाव और दिशाहीनता हो सकती है।
सभी ग्रहों की महादशाओं में शुक्र की महादशा की अवधि सबसे लंबी होती है, जो 20 वर्ष तक होती है। शुक्र भौतिक सुख-सुविधा, सौंदर्य, लग्जरी लाइफ, विलासिता और प्रेम का प्रतीक है। शुक्र अगर शुभ न हो तो महादशा के दौरान गुप्त रोग, किडनी समस्या, अधिक खर्च और रिश्तों में उलझन जैसे परिणाम दे सकता है।
कुंडली में महादशा अकेले काम नहीं करती। इसके भीतर छोटे-छोटे कालखंड भी होते हैं, जिन्हें अंतर्दशा और प्रत्यंतर दशा कहा जाता है। महादशा पर मुख्य ग्रह का शासन होता है। महादशा के भीतर दूसरे ग्रह का समय शुरू हो जाता है , जो अंतर्दशा होती है और प्रत्यंतर दशा कुछ दिन या महीनों की होती है। यह तत्काल घटनाओं को प्रभावित करती है। उदाहरण के तौर पर अगर महादशा पुस्तक है तो अंतर्दशा मुख्य अध्याय और प्रत्यंतर दशा को उसकी कहानी समझा जा सकता है।
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अध्याय 46 के अनुसार- 'जन्म नक्षत्रात् दशा:', इसका अर्थ है- जन्म नक्षत्र से दशाएं शुरू होती हैं। कुंडली में महादशा निकालने की विधि जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र और विंशोत्तरी दशा प्रणाली पर आधारित होती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पहली महादशा जन्म के समय चंद्रमा की स्थिति से तय की जाती है। महादशा निकालने के चरण में सबसे पहले जन्म नक्षत्र देखना होता है, फिर दशा-शेष की गणना की जाती है। इसके बाद ग्रह और ग्रहों की अवधि के आधार पर महादशा निकाली जाती है।
अगर आपको पता नहीं कि, अभी आपकी कुंडली में कौन सी महादशा चल रही है या फिर अपनी महादशा निकालना चाहते हैं तो एस्टोटॉक के दशा कैलकुलेटर पर अपना नाम, लिंग, जन्मतिथि, जन्म समय और जन्म स्थान जैसी जानकारी डालकर आप जान सकते हैं कि, आपकी कुंडली में अभी किस ग्रह की महादशा चल रही है।
A. किसी ग्रह की महादशा का सकारात्मक या नकारात्मक होना कुंडली में उस ग्रह की स्थिति, भाव और नक्षत्र स्वामी पर निर्भर करता है।
A. विंशोत्तरी दशा प्रणाली के अनुसार शुक्र ग्रह की महादशा सबसे लंबी 20 वर्ष की होती है।
A. गुरु महादशा को सकारात्मक प्रभाव लाने वाला माना जाता है। लेकिन इसकी शुभता ग्रह की स्थिति और मजबूती पर निर्भर करती है।
A. राहु, केतु और शनि की महादशा को खतरनाक माना जाता है। कुंडली में अगर ये ग्रह शुभ या मजबूत हों तो व्यक्ति राजा की तरह जीता है। लेकिन महादशा का अंतिम चरण थोड़ा कष्टकारी हो सकता है।
A. सीधे तौर पर किसी भी एक महादसा को अच्छा नहीं कहा जा सकता है। किसी की महादशा शुभ होती है, यह उस ग्रह की स्थिति पर निर्भर करती है।
A. शनि की महादशा 19 वर्ष की होती है। इस दौरान झूठ, धोखाधड़ी, आलस्य, अन्याय और किसी का अपमान नहीं करना चाहिए।