गोवर्धन पूजा पांच दिवसीय दीपोत्सव का एक हिस्सा है, जिसे पांच दिनों के क्रम में चौथे दिन मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा दीपावली के ठीक अगले दिन की जाती है। इसे अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है। गोवर्धन पूजा का पर्व विशेषरूप से भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत से जुड़ा है, जो हर साल कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। यह त्योहार अहंकार पर विनम्रता की विजय का प्रतीक है। इंद्रदेव ने जब अहंकार में आकर मूसलाधार वर्षा की तो, भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर लोगों और पशुओं की रक्षा की। इसलिए इस पर्व को भगवान श्रीकृष्ण, पशुओं और गोवर्धन पर्वत की स्मृति में मनाया जाता है। अगर आप जानना चाहते हैं कि, 2026 में गोवर्धन पूजा का पर्व कब पड़ेगा, इस पर्व का क्या महत्व है, इस दिन पूजा के लिए शुभ मुहूर्त क्या रहेगा, इसकी पूजा विधि क्या है? तो आगे आपको इस बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी मिलेगी।
हिंदू पंचांग के अनुसार गोवर्धन पूजा हर साल कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है। हालांकि अंग्रेजी कैलेंडर में हर साल यह तिथि बदल जाती है।
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विवरण |
तिथि और मुहूर्त |
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त्योहार |
गोवर्धन पूजा/अन्नकूट |
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गोवर्धन पूजा 2026 |
मंगलवार, 10 नवंबर 2026 |
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कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा आरंभ |
सोमवार 9 नवंबर, दोपहर 12:31 बजे |
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कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा समाप्त |
मंगलवार 10 नवंबर, दोपहर 2:00 बजे तक |
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गोवर्धन पूजा मुहूर्त |
सुबह 6:40 से 8:50 बजे तक |
नोट: ऊपर दी गई तालिका में पूजा का शुभ मुहूर्त नई दिल्ली के समय के अनुसार है। यदि आपको अपने शहर के अनुसार पूजा मुहूर्त की सटीक जानकारी चाहिए तो इसके लिए स्थानीय आज का पंचांग देखना सबसे अच्छा रहेगा।
गोवर्धन पूजा या अन्नकूट हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है, जिसे हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व में मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है। पूजा के लिए सभी भक्त एक जगह पर एकत्रित होते हैं, गाय के गोबर और फूल-पत्तियों से प्रतीकात्मक गोवर्धन पर्वत बनाई जाती है, पूजा-पाठ करने के बाद उसकी परिक्रमा करते हैं। जो लोग अपनी आजीविका के लिए पशु-पालन करते हैं वे भी इस दिन पूजा-पाठ कर भगवान कृष्ण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। पूजा में भगवान को अन्नकूट चढ़ाया जाता है और बाद में इसे प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
अगर आप गोवर्धन पूजा के बारे में अंग्रेजी में पढ़ना चाहते हैं, तो Govardhan Pooja 2026 पर क्लिक करें
हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व है। अगर आप गोवर्धन पूजा के बारे में नहीं जानते हैं तो यहां नीचे इस संबंध में विस्तृत जानकारी दी जा रही है।
ब्रजवासी सूखे और बाढ़ के भय से मुक्त रहने के लिए इंद्र देव की पूजा करते थे और यज्ञ चढ़ाते थे। एक बार भगवान कृष्ण ने इसका विरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप इंद्र ने मूसलाधार बारिश करके पूरे गांव को जलमग्न कर दिया। तब ब्रजवासियों की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाए रखा। इसलिए यह पर्व श्रीकृष्ण के बलिदान, कृष्ण के प्रति भक्ति और विजय का प्रतीक माना जाता है।
गोवर्धन पर्वत को पोषण और सुरक्षा के स्रोत के रूप में दर्शाया गया है। श्रीकृष्ण ने ग्रामीणों को यह अहसास दिलाया कि उनकी आजीविका जंगलों, नदियों और पशु-पक्षियों पर निर्भर रहती है। इसलिए हमें प्रकृति की पूजा करनी चाहिए और संसाधनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।
श्रीकृष्ण का पशुओं, विशेषकर गायों से गहरा संबंध था। गांव के लोग भी आजीविका के लिए पशुओं पर निर्भर रहते थे। गोवर्धन पूजा का पर्व भी प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और पशुओं के प्रति आभार व्यक्त करने का भी दिन है। गोवर्धन पूजा का दिन लोगों के भरण-पोषण में गायों की भूमिका और भगवान कृष्ण के साथ उनके घनिष्ठ संबंध को दर्शाता है।
गोवर्धन पूजा पर कई प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं, पूजा के दौरान परिक्रमा की जाती है, भजन गाए जाते हैं, आरती होती है और अन्नकूट बांटा जाता है। इस प्रकार यह पर्व एकजुट होकर आध्यात्मिकता और समुदाय के रूप में आगे बढ़ने की भावना को प्रेरित करता है।
गोवर्धन पूजा के लिए पारिवारिक परंपरा और रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा की सामग्री अलग-अलग हो सकती है। लेकिन आप आमतौर पर गोवर्धन पूजा में इस्तेमाल होनी वाली सामान्य सामग्रियों के बारे में जानना चाहते हैं, तो यहां इसकी सूची दी गई है। आप पूजा से पहले इन सामग्रियों की व्यवस्था कर अपने कार्य को आसान बना सकते हैं।
अगर आप गोवर्धन पूजा विधि की पूरी प्रकिया के बारे में चरण-दर-चरण विस्तारपूर्वक जानना चाहते हैं तो यहां कुछ महत्वपूर्ण चरण बताए गए हैं, जिनका पालन कर आप पूजा कर सकते हैं। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि, पारिवारिक परंपरा और रीति-रिवाजों के आधार पर इनमें कुछ चरण अलग भी हो सकते हैं।
पूजा से पहले पूजा स्थल की साफ-सफाई और शुद्धता का ध्यान रखें। पूजा स्थल साफ और स्वच्छ रहने से ही सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। पूजा स्थल की सफाई के बाद सभी सामग्रियों को अच्छी तरह से व्यवस्थित करें।
पूजा स्थल के पास ही पूजा शुरू करने से पहले एक प्रतीकात्मक गोवर्धन टीला बनाया जाता है। आमतौर पर, इसे बनाने के लिए गाय के गोबर और चिकनी मिट्टी का उपयोग किया जाता है। गोवर्धन टीला बनाने के बाद आप यहां फूल,पत्तियां, रंगोली और दीपों से सजावट भी कर सकते हैं।
गोवर्धन पर्वत बनाने के बाद यहां श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। यह उस दृश्य को दर्शाता है जिसमें भगवान कृष्ण ने ब्रजवासियों को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया था। पूजा की सामग्रियां जैसे कुमकुम, अक्षत, फूल, फल आदि अर्पित करने के बाद धूप-दीप जलाएं।
गोवर्धन पूजा में श्रीकृष्ण को अन्नकूट का भोग लगाने की परंपरा है। सब्जियों, अनाज, मिठाई, फल और अन्य व्यंजनों से अन्नकूट तैयार करें। इसमें तुलसी के पत्ते जरूर डालें। अन्नकूट आमतौर पर 56 भोग भी हो सकता है। कहा जाता है कि, भगवान श्रीकृष्ण ने 7 दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर रखा था और इस दौरान उन्होंने भोजन भी नहीं किया था, जबकि मां यशोदा श्रीकृष्ण को एक दिन में 8 पहर भोजन कराती थी। इसलिए गोवर्धन पूजा पर (7 दिन × 8 पहर)= 56 अलग-अलग प्रकार के व्यंजन तैयार कर भोग लगाया जाता है।
भगवान कृष्ण को अन्नकूट अर्पित करने के बाद गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करनी चाहिए। कुछ लोग इस समय पानी से भरा तांबे का कलश हाथों में लेकर परिक्रमा करते हैं। दक्षिणावर्त दिशा में 7 बार परिक्रमा करते हुए कलश से थोड़ा-थोड़ा पानी नीचे गिराते रहें।
पूजा प्रक्रिया समाप्त होने के बाद श्रीकृष्ण की आरती करें। आरती के बाद पूजा संपन्न मानी जाती है। इसके बाद हाथ जोड़कर पूजा के दौरान जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए भगवान से क्षमायाचना करें। अंत में, भगवान को अर्पित किया अन्नकूट भोग स्वरूप सभी में वितरित करें।
गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा भगवान कृष्ण के ब्रज में बचपन से जुड़ी है। कथा के अनुसार, एक बार ब्रजवासी इंद्र देव की पूजा की तैयारी कर रहे थे। कृष्ण को यह चीज बहुत ही अचरज लगी। उन्होंने देखा कि नंदबाबा भी इंद्रदेव की पूजा की तैयारियों में जुटे हैं। तब कृष्ण ने नंदबाबा से पूछा कि, सभी लोग इंद्र देव की पूजा क्यों करते हैं? नंदबाबा ने बताया कि, भगवान इंद्र वर्षा के देवता हैं। उनकी कृपा से खेतों में अन्न की अच्छी पैदावार होती है और हमारे गायों को चारा मिलता है।
श्रीकृष्ण ने कहा कि, हमें इंद्र देव की पूजा करने के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। गोवर्धन पर्वत से हमारे पशुओं को चरागाह उपलब्ध होता है और यही उनके जीवनयापन का साधन है। ब्रजवासियों की कृष्ण की बात सही लगी और वे इंद्र की पूजा रोक कर गोवर्धन पर्वत की पूजा की तैयारियां करने लगे।
इधर इंद्र देव को जब इस बारे में पता चला तो उन्होंने इसे अपना अपमान माना और क्रोधित हो गए। बदला लेने के लिए इंद्र देव ने ब्रज में मूलसाधार बारिश शुरू कर दी। इस घटना से ब्रजवासी भयभीत हो गए। वे सोचने लगे कि अब उनका और उनके पशुओं का क्या होगा। मदद के लिए सभी श्रीकृष्ण की शरण में पहुंचे। तब श्रीकृष्ण ने अपने बाएं हाथ की छोटी ऊंगली से गोवर्धन पर्वत को ही उठा लिया।
श्रीकृ्ष्ण ने ब्रजवासियों और पशुओं को गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण देकर उनकी रक्षा की। श्रीकृष्ण सात दिनों तक लगातार पर्वत को अपनी ऊंगली पर उठाए रहें, जिससे इंद्र को भगवान की अलौकिक शक्तियों का अनुभव हुया और इंद्र ने तुरंत बारिश रोक दी। इंद्र को जब बाद में पता चला कि, श्रीकृष्ण और कोई नहीं बल्कि भगवान विष्णु के ही अवतार हैं तो उन्होंने उनसे क्षमा मांगी। इंद्र देव की याचना पर श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और ब्रजवासियों से कहा कि, वे हर साल गोवर्धन पर्वत की पूजा करेंगे। इसी घटना के बाद से ही गोवर्धन पूजा पर्व की परंपरा की शुरुआत हुई।
A. नहीं, गोवर्धन पूजा दिवाली के दूसरे दिन होती है। दिवाली कार्तिक अमावस्या के दिन मनाई जाती है, जबकि गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर की जाती है।
A. गोवर्धन पूजा में वैसे किसी देवता की नहीं बल्कि गोवर्धन पर्वत की पूजा का महत्व है। लेकिन इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के उस स्वरूप पूजा की जाती है, जिसमें उन्हें गोवर्धन पर्वत उंगली पर उठाए हुए दर्शाया गया हो। इसके अलावा इस दिन गायों की भी पूजा होती है।
Q. गोवर्धन पूजा में गोवर्धन पर्वत की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए?
A. गोवर्धन पूजा में गोबर से बने प्रतीकात्मक पर्वत की 7 या 11 बार परिक्रमा की जाती है। वहीं मधुरा में स्थित गोवर्धन पर्वत की मुख्य परिक्रमा 7 कोस (21 किमी) की होती है।
A. प्रतीकात्मक गोवर्धन पर्वत बनाने के लिए गाय के गोबर का उपयोग करना चाहिए। लेकिन गोबर उपलब्ध न हो तो आप चिकनी मिट्टी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं।
A. धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत के मध्य भाग को अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठाया था, जिसे शरीर का मध्य भाग नाभि माना जाता है। इसलिए पूजा के दौरान गोवर्धन जी की नाभि पर दीपक रखा जाता है।