इसमें ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति देखकर तिथि, वार, योग, करण और शुभ-अशुभ समय की गणना की जाती है। यही कारण है कि शादी-विवाह, गृह प्रवेश, पूजा-पाठ और त्योहारों के लिए पंचांग का विशेष महत्व माना जाता है। वैदिक मान्यताओं के अनुसार हिन्दू पंचांग को “विक्रम संवत” से भी जोड़ा जाता है, जिसकी शुरुआत राजा विक्रमादित्य के समय मानी जाती है। आज भी उत्तर और पश्चिम भारत के कई हिस्सों में विक्रम संवत का उपयोग किया जाता है।
हिन्दू कैलेंडर और सामान्य कैलेंडर में क्या अंतर है?
आज हम जिस अंग्रेजी कैलेंडर का इस्तेमाल करते हैं, वह सूर्य की गति पर आधारित है और उसमें 365 दिन होते हैं। वहीं हिन्दू कैलेंडर मुख्य रूप से चंद्रमा की गति के अनुसार बनाया गया है। इसी कारण हिन्दू पंचांग का एक वर्ष लगभग 354 दिनों का माना जाता है। चूंकि दोनों कैलेंडर के दिनों में अंतर होता है, इसलिए हर तीन साल में हिन्दू पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे 'अधिक मास' कहा जाता है। इसके अलावा इसे 'पुरुषोत्तम मास' के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह महीना पूजा-पाठ, दान और भक्ति के लिए बेहद शुभ माना जाता है। हालांकि इस दौरान शादी-विवाह जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।
हिन्दू पंचांग में कैसे बदलता है चंद्रमा?
इस महीने का पंचांग कैलेंडर देखने पर आप पाएंगे कि हिन्दू महीने दो भागों में बंटे होते हैं- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। शुक्ल पक्ष वह समय होता है जब चंद्रमा धीरे-धीरे बढ़ता है और पूर्णिमा की ओर जाता है। वहीं कृष्ण पक्ष में चंद्रमा घटता हुआ अमावस्या की ओर बढ़ता है।
शुक्ल पक्ष के 15वें दिन को पूर्णिमा कहा जाता है, जबकि कृष्ण पक्ष के अंतिम दिन को अमावस्या माना जाता है। ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं में इन दोनों तिथियों का विशेष महत्व बताया गया है। आज भी लाखों लोग त्योहार, व्रत, शुभ मुहूर्त और पूजा-पाठ की सही जानकारी के लिए हिंदी पंचांग और हिन्दू कैलेंडर का सहारा लेते हैं।