जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जितिया व्रत, जीवित पुत्र व्रत या जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है, माताएं संतान की लंबी आयु, स्वस्थ्य जीवन और सफलता के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। परंपरागत रूप से इस व्रत को कठिन, महत्वपूर्ण और फलदायी माना जाता है। जितिया व्रत विशेषतौर पर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, उड़ीसा के कुछ क्षेत्रों के साथ नेपाल के तराई-मधेश क्षेत्र में भी रखा जाता है। जितिया केवल पारंपरिक व्रत नहीं बल्कि जीवंत धरोहर भी है। आइए जानते हैं जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत से जुड़ी संपूर्ण जानकारी।
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दिन |
तिथि |
क्या होता है |
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पहला दिन (नहाय-खाय) |
2 अक्टूबर 2026 |
स्नान, शुद्धि, संकल्प और पूजा की तैयारी। कई घरों में पारिवारिक परंपरा के अनुसार नहाय-खाय पर मछली बनाई जाती है, कुछ स्थानों में रागी के आटे की रोटी, नोनी साग, सतपुतिया की सब्जी बनती है। वहीं कुछ जगहों पर सात्विक भोजन खाया जाता है। |
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दूसरा दिन (व्रत-पूजा) |
3 अक्टूबर 2026 |
पूरे दिन निर्जला व्रत रखा जाता है, संध्याकाल में पूजा-पाठ किए जाते हैं और जितिया व्रत की कथा सुनी जाती है। |
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तीसरा दिन (पारण) |
4 अक्टूबर 2026 |
सूर्योदय के बाद स्नानादि कर माताएं पूजा करती हैं, दान देती हैं और फिर निर्जला व्रत खोला जाता है। |
पंचांग के अनुसार, हर साल आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जाता है। इस वर्ष यह व्रत शनिवार, 3 अक्टूबर 2026 को पड़ रहा है। आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर सुबह 7 बजकर 58 मिनट से शुरू हो जाएगी, जिसका समापन 4 अक्टूबर सुबह 5 बजकर 52 मिनट पर होगा।
बता दें कि कई क्षेत्रों में जितिया की पूजा संध्याकाल में तो कुछ क्षेत्रों में अगली सुबह की जाती है।
जिवित्पुत्रिका व्रत संतान की दीर्घायु और कल्याण के लिए रखा जाने वाले पारंपरिक व्रत है। प्राचीन प्रथा में यह व्रत पुत्रों की माताओं द्वारा रखा जाता था। हालांकि आधुनिक समय में इसे पुत्र और पुत्री सभी संतानों की रक्षा व सुरक्षा के लिए रखा जाता है। जीवित्पुत्रिका व्रत की पूजा-पद्धित अन्य व्रत-त्योहारों से थोड़ी अलग होती है। यह एक नहीं बल्कि तीन दिवसीय मातृ व्रत होता है। सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक निर्जला व्रत रखकर अपना संकल्प पूरा करती हैं। इस दौरान कई नियमों का भी पालन करना पड़ता है, जिसकी शुरुआत एक दिन पहले यानी नहाय-खाय से ही हो जाती है।
व्रत से एक दिन पहले नहाय-खाय की परंपरा निभाई जाती है। इस दिन घर और विशेषकर पूजा स्थल को साफ व शुद्ध किया जाता है। स्नान के बाद साफ वस्त्र धारण कर लें और व्रत का संकल्प लें। पूजा से जुड़ी सारी सामग्रियों को एकत्रित कर लें और परंपरा अनुसार भोजन तैयार करें। अगली सुबह यानी जितिया व्रत वाले दिन जल्दी उठकर स्नान करें और शुभ मुहूर्त में पूजा करें। पूजा स्थल के पास बैठ जाएं और पूजा करें। सबसे पहले दीपक जलाएं और फूल, फल, जल, अक्षत, प्रसाद आदि रखें। आप अन्य परंपरागत पूजा सामग्रियों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। परंपरा के अनुसार चील सियार या फिर जीमूतवाहन देवता की कथा सुनें या पढ़ें। व्रत के अगले दिन अष्टमी तिथि की समाप्ति और सूर्योदय के बाद ही पारण करके अपना व्रत खोलें।
बता दें कि जितिया व्रत की पूजा और परंपरा क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग होती है। आप अपने परिवार में निरंतर चली आ रही परंपरा का पालन करें।
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जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत में मुख्य रूप से राजा जीमूतवाहन की पूजा करने का विधान है। जितिया पर माताएं जीमूतवाहन की पूजा करती हैं और संतान की कुशलता की कामना करती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, जीमूतवाहन गंधर्वों से राजकुमार माने जाते हैं, जिन्होंने नागों की रक्षा के लिए अपने प्राण का बलिदान दे दिया। इसके अलावा जितिया में भगवान सूर्य देव और जितिया माता की पूजा का भी विधान है।
जितिया व्रत की पूजा में कई क्षेत्रों में चील और सियार की कथा सुनी और पढ़ी जाती है,जिन्होंने अपनी संतानों के लिए व्रत रखने का संकल्प लिया था। पौराणिक कथा के अनुसार, नर्मदा नदी के तट पर एक मादा चील और एक मादा सियारिन रहती थीं। दोनों सखियां थीं। एक बार उन्होंने देखा कि, नदी के पास कुछ स्त्रियां जितिया व्रत की पूजा कर रही हैं, तब उन्होंने ने भी जितिया व्रत रखने का निश्चय किया। लेकिन उस रात सियारिन को बहुत भूख लग गई। वह स्वयं पर नियंत्रण न रख सकी और छिपकर भोजन खा लिया, जिससे उसका व्रत खंडित हो गया। लेकिन चीलनी ने निर्जला व्रत रखकर अपना संकल्प और व्रत पूरा किया। अगले जन्म में दोनों का जन्म मानव रूप में हुआ और वे सगी बहनें बनीं। चीलनी का नाम शीलवती रखा गया, और उसकी शादी बुद्धिसेन से हुई। वहीं सियारिन का नाम कपुरावती रखा गया और उसका विवाह नगर के राजा मलायकेतु के साथ हुआ।
भगवान जीमूतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती के सात पुत्र हुए। कपुरावती के भी कई पुत्र हुए, लेकिन सभी जन्म के कुछ समय बाद मर गए। धीरे-धीरे शीलवती के सातों पुत्र बड़े होने लगे। बहन के पुत्रों को देख कपुरावती को जलन होने लगी और उसने राजा से कहकर सभी पुत्रों के सिर कटवा दिए। इसके बाद उसने 7 नए बर्तन मंगवाए। सभी बर्तनों में पुत्रों के सिर रखकर कपड़े से ढककर बहन के घर भिजवा दिया। लेकिन जीमूतवाहन देवता की कृपा से शीलवती के पुत्रों को कुछ नहीं हुआ और वे सभी जीवित होकर महल पहुंच गए। कपूरावती ने सिर काटकर जो संदेश भेजे थे, वे फल बन गए। इधर कपूरावती यह खबर सुनने व्याकुल हो रही थी कि उसकी बहन के सभी पुत्रों की मृत्यु हो गई। लेकिन काफी समय बीतने के बाद जब कोई सूचना नहीं मिली तो वह स्वयं बहन के महल पहुंच गई और सभी पुत्रों को जिंदा देख सन्न रह गई। कपूरावती को अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ। उसने भगवान से माफी मांगी। इसके बाद उसे अपने पिछले जन्म और व्रत भंग की सारी बातें याद आ गईं। अलग-अलग क्षेत्रों और भाषाओं में कथन का विवरण अलग-अलग हो सकता है। लेकिन कथा से यही सीख मिलती है कि, जितिया व्रत को दिखावे के लिए नहीं बल्कि ईमानदारी से, बिना छल, ईष्या और दूसरों को हानि पहुंचाए करना चाहिए।
जितिया व्रत की पौराणिक कथा महाभारत काल से भी मानी जाती है, जिसके अनुसार- महाभारत युद्ध में अपने पिता गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु का बदला लेने के लिए अश्वत्थामा पांडवों के शिविर में घुस गया। शिविर के अंदर पांच लोग को सोया पाकर अश्वत्थामा ने उन्हें पांडव समझकर मार दिया। लेकिन वे द्रोपदी की संतानें थीं, जो मारी गईं। इसके बाद अर्जुन ने अश्वत्थामा को बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि उसके माथे से निकाल ली। अश्वत्थामा ने फिर से बदला लेने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे अजन्मे बच्चे को मारने की कोशिश की और उसने ब्रह्मास्त्र से उत्तरा के गर्भ को नष्ट कर दिया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा की अजन्मी संतान को फिर से जीवित कर दिया। गर्भ में मरने के बाद जीवित होने के कारण उस बच्चे को जीवित्पुत्रिका के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इसके बाद ही संतान की लंबी उम्र के लिए जितिया का व्रत रखने की परंपरा की शुरुआत हुई।
A: हां, सभी एक ही व्रत के प्रचलित क्षेत्रीय नाम और वर्तनी हैं।
A: जितिया व्रत का पारण सूर्योदय के बाद और आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद करना चाहिए।
A: परंपरागत रूप से यह व्रत माताओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए केवल माताएं ही संतान की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं। हालांकि आप अपने परिवार या समुदाय की परंपरा का पालन कर सकते हैं।
A: हां, पुराने समय में इसे सिर्फ पुत्रों के लिए रखा जाता है। लेकिन अब कई परिवार में पुत्र-पुत्री दोनों संतान की लंबी आयु के लिए जितिया व्रत रखा जाता है।