दीपावली सुख-समृद्धि, प्रकाश, दीप और खुशियों का सबसे बड़ा उत्सव है, जिसे आम बोलचाल की भाषा में दिवाली भी कहा जाता है। दीपावली भारत के सबसे लोकप्रिय त्योहारों में से एक है। इसे परिवार, रिश्तेदारों, पड़ोसियों और दोस्तों संग उत्साह और उमंगपूर्वक मनाया जाता है। दिवाली वह दिन है जब रिश्तेदारों और दोस्तों के बीच उपहारों का आदान-प्रदान होता है, स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया जाता है, पटाखे जलाए जाते हैं और घर पर पूजा-पाठ के साथ आध्यात्मिक माहौल रहता है। यही कारण है कि, दिवाली को लेकर हर साल लोगों की उमंग बढ़ जाती है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस दिन का महत्व क्या है या दीपावली का त्योहार आखिर हम क्यों मनाते हैं? साल 2026 में दीवाली की तिथि, लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त, पूजा विधि और अन्य जानकारियां चाहिए तो, यहां आपको दीपावली से जुड़े रीति-रिवाज, परंपरा और मुहूर्त आदि के बारे में विस्तार पूर्वक बताया जा रहा है।
दीपावली का त्योहार पंचांग के अनुसार हर साल कार्तिक अमावस्या तिथि पर मनाई जाती है। लेकिन अंग्रेजी कैलेंडर में हर साल तिथि बदल जाती है। इस वर्ष 2026 में दीपावली की तिथि और लक्ष्मी पूजन के मुहूर्त के बारे में अगर आप जानना चाहते हैं तो, नीचे दी गई तालिका में सभी विवरण है।
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दीपावली का विवरण |
तिथि और मुहूर्त |
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दीपावली 2026 |
रविवार, 8 नवंबर 2026 |
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कार्तिक अमावस्या तिथि आरंभ |
8 नवंबर 2026, सुबह 11:27 बजे |
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कार्तिक अमावस्या तिथि समाप्त |
9 नवंबर 2026, दोपहर 12:31 बजे |
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लक्ष्मी पूजन मुहूर्त |
8 नवंबर 2026, शाम 5:54 से 7:50 बजे |
नोट- लक्ष्मी पूजा मुहूर्त का यह मुहूर्त नई दिल्ली के समयानुसार है। अगर आप अपने शहर या स्थान के अनुसार पूजा के लिए शुभ मुहूर्त जानना चाहते हैं, तो स्थानीय दैनिक पंचांग देखना सबसे सटीक रहेगा।
दिवाली एक दिन का त्योहार नहीं बल्कि पांच दिनों का उत्सव होता है, जिसकी शुरुआत धनतेरस से हो जाती है और भाई दूज तक चलती है। जानें पांच दिनों तक चलने वाले दीपोत्सव में किस दिन कौन सा त्योहार मनाया जाएगा और इसका क्या महत्व है। साथ ही यहां हर दिन के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है-
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दिन |
त्योहार |
तिथि |
महत्व |
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पहला दिन |
धनतेरस |
शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 |
धन, आरोग्य, समृद्धि और धन्वंतरि |
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दूसरा दिन |
छोटी दिवाली / नरक चतर्दशी |
शनिवार, 7 नवंबर 2026 |
नरकासुर पर विजय और अनुष्ठान शुद्धिकरण |
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तीसरा दिन |
दीपावली / लक्ष्मी पूजा |
रविवार, 8 नवंबर 2026 |
लक्ष्मी पूजा और दीप जलाकर उत्सव मनाना |
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चौथा दिन |
गोवर्धन पूजा |
सोमवार, 9 नवंबर 2026 |
गोवर्धन और श्रीकृष्ण की पूजा |
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पांचवा दिन |
भाई दूज |
मंगलवार,10 नवंबर 2026 |
भाई-बहन के अटूट प्रेम का उत्सव |
पांच दिवसीय दीपोत्सव का पहला दिन धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। इसे धन त्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। पंचांग के अनुसार, धनतेरस हर साल कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर मनाई जाती है। इस दिन खरीदारी करने, देवी लक्ष्मी, भगवान धन्वंतरि और कुबेर देव की पूजा करने का महत्व है। धनतेरस के दिन सोने-चांदी के आभूषण या पीतल, तांबे जैसी धातुओं के बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। धनतेरस पर झाड़ू, कौड़ी, साबुत धनिया के बीज और नमक आदि भी खरीदने की मान्यता है।
धनतेरस के अगले दिन और दीपावली से पहले छोटी दिवाली का उत्सव मनाया जाता है। इसे आत्मचिंतन और शुद्धि का दिन माना जाता है। मान्यता है कि, भगवान राम 14 वर्षों का वनवास पूरा कर जब अयोध्या लौटने वाले थे तब पूरी अयोध्या नगरी की साफ-सफाई कर दीपों की जगमगाहट से सजाया गया था। अयोध्यावासियों ने अपने अहंकार, नकारात्मकता और अंधकारमय शक्तियों को दूर करके भगवान राम, देवी सीता और लक्ष्मण जी का स्वागत कियाथा। आधुनिक युग में भी यह दिन अपने भीतर के नकारात्मक विचारों और ऊर्जाओं को शुद्ध करने का दिन है।
पांच दिवसीय दीपोत्सव में दीपावली तीसरा और महत्वपूर्ण दिन होता है। यह त्योहार भगवान राम, देवी सीता और भगवान लक्ष्मण के वनवास पूरा कर अयोध्या आगमन का प्रतीक है। आध्यात्मिक रूप से इस दिन को सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ा माना जाता है। भगवान राम लंकापति रावण का वध कर अयोध्या लौटे थे, जिस कारण यह दिन बुराई पर अच्छाई की विजय को दर्शाता है और बताता है कि परिस्थिति चाहे जैसी भी हो, हमें अपने जीवन में सही मार्ग और धर्म का चुनाव करना चाहिए। इसलिए इस दिन घर के कोने-कोने को दीपों से रोशन किया जाता है, द्वार पर रंगोली बनाई जाती है, फूल और तोरण सजाए जाते हैं। दीपावली पर लक्ष्मी पूजन करने का महत्व है, जिससे कि आर्थिक स्थिरता, सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति हो सके। घरों में विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं, उपहारों का आदान-प्रदान होता हैं और बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है।
दीपोत्सव के चौथे दिन को गोवर्धन पूजा के नाम से जाना जाता है। यह उत्सव भगवान कृष्ण और गोवर्धन पर्वत से जुड़ा है। पौराणिक कथा के अनुसार, त्रेता युग में जब श्रीकृष्ण ने वृंदावन के लोगों को इंद्र के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए प्रोत्साहित किया, तो क्रोधित होकर इंद्र देव ने भारी बारिश कराई। तब कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली से गोवर्धन पर्वत को उठाकर लोगों और पशुओं की रक्षा की थी। इसलिए इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है।
भाई दूज भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और बंधन का उत्सव है। रामायण के अनुसार, राजा दशरथ की एक बड़ी बेटी थी जिसका नाम शांता था। जब भगवान राम वनवास से लौटे तब अयोध्या के सभी लोग राम, लक्ष्मण और सीता का स्वागत करने के लिए उपस्थित थे, लेकिन शांता किसी कारण नहीं आ सकी। दिवाली के बाद शांता ने अपने भाइयों के घर लौटने की खुशी में उन्हें टीका लगाया। तब से यह दिन भाई दूज के रूप में मनाया जाने लगा।
दीपावली मनाने के संदर्भ में कई कथा-कहानियां और धार्मिक मान्यताएं हैं। यही कारण है कि विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में इसका महत्व भिन्न हो सकता है। यहां आपको दीपावली मनाने से जुड़ी कुछ प्रचलित कथा-कहानियों के बारे में बताया जा रहा है।
दिवाली का त्योहार मनाने की सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, दिवाली श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने और रावण पर विजय प्राप्त करने का उत्सव है। भगवान राम, भगवान लक्ष्मण और देवी सीता 14 वर्षों के लिए वनवास गए थे। इसी दौरान लंकापति रावण ने देवी सीता का अपहरण कर लिया था। मान्यता है कि, 14 वर्षों का वनवास पूरा करके राम, लक्ष्मण और सीता दिवाली के समय ही अयोध्या लौटे थे। कहा जाता है कि, जब तीनों अयोध्या आए तब कार्तिक अमावस्या की रात थी, जिस कारण अयोध्या में अंधेरा था। तब अयोध्या वासियों ने तीनों का स्वागत करने के लिए पूरी अयोध्या को दीपों से रोशन किया था।
दिवाली मनाने का एक और महत्वपूर्ण कारण यह माना जाता है कि, यह धन-समृद्धि से जुड़ा उत्सव है। इस दिन देवी लक्ष्मी का आगमन होता है, जो धन और वैभव की देवी हैं। धनतेरस को देवी लक्ष्मी के घर आगमन का प्रतीक माना जाता है, जबकि दिवाली वह विशेष दिनों में एक है, जब माता लक्ष्मी की पूजा-अराधना की जाती है, जिससे धन, समृद्धि और सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है।
दिवाली में घर की साफ-सफाई, खरीदारी और उपहारों के आदान-प्रदान का रिवाज है। इस समय कई ऐसी चीजें होती हैं, जिन्हें करने के लिए समय की कमी महसूस होने लगती है। इसलिए लक्ष्मी पूजा की सामग्री पहले से एकत्रित कर लेनी चाहिए, जिससे कि पूजा के दौरान किसी तरह की बाधा उत्पन्न न हो। यहां आपको लक्ष्मी पूजा में उपयोग होनी वाली सामान्य पूजा सामग्रियों के बारे में बताया जा रहा है, जो आपके काम को आसान बनाने में मदद करेगी।
अगर आप दीपावली उत्सव के काफी उत्सुक हैं और इसकी पूजा विधि जानना चाहते हैं तो यहां विभिन्न रीति-रिवाजों और धर्मों के अनुसार दिवाली की पूजा विधि बताई जा रही है।
दिवाली के दिन घर साफ-सुथरा हो, इसका विशेष ध्यान रखें। खासतौर पर घर का मुख्य द्वार और पूजास्थल साफ और शुद्ध होने चाहिए। दिवाली मुख्य रूप से लक्ष्मी पूजन का दिन होता है। इस शुभ दिन लोग मां लक्ष्मी के आगमन के लिए पूजा-पाठ करते हैं। लेकिन देवी लक्ष्मी का वास उन्हीं घरों पर होता है, जहां साफ-सफाई होती है। इसलिए दिवाली के दिन अपने घर के कोने-कोने को साफ रखें।
घर और पूजा स्थल की सफाई के बाद पूजा स्थल और घर की सजावट करें। सफाई के बाद पूरे घर पर गंगाजल का छिड़काव करें, मुख्य द्वार पर रंगोली बनाएं, दरवाजे के ऊपर तोरण लगाएं, मां लक्ष्मी का पदचिह्न लगाएं और संध्याकाल में दीप जलाएं।
दीपावली को लक्ष्मी पूजा भी कहा जाता है। लेकिन इस दिन मां लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। मां लक्ष्मी से आर्थिक समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है और भगवान गणेश की पूजा से कष्ट और बाधाएं दूर होती हैं। इसलिए इस दिन लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति स्थापित करें और विधि-विधान से पूजन करें। कुछ परंपराओं में दिवाली पर भगवान कुबेर और देवी सरस्वती की मूर्तियां भी स्थापित की जाती हैं। हालांकि यह पूरी तरह से आपकी परिवार परंपरा और रीति-रिवाजों पर निर्भर करता है।
मूर्ति की स्थापना के बाद समय आता है कलश स्थापित करने का। कलश स्थापना से घर पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और देवी-देवताओं का वास होता है। दीपावली की पूजा में कलश स्थापना मुख्य अनुष्ठान माना जाता है। कलश स्थापना के लिए सबसे पहले एक मिट्टी या पीतल का कलश लें और कलश पर तिलक लगाएं, कलावा बाधें और उसमें साफ जल और गंगाजल भरें। अब कलश में एक सिक्का, सुपारी, हल्दी की गांठ, फूल और अक्षत डालें। ऊपर से आम के पांच पत्ते लगाकर कलश को किसी ढक्कन से ढक दें। इसके बाद ऊपर एक जटा वाला नारियल रखें। कलश की स्थापना करने के बाद हाथ जोड़कर देवी लक्ष्मी का आह्वान करें।
मूर्ति और कलश स्थापित हो जाने के बाद अब दिवाली पूजन की शुरुआत करें। दीपावली की पूजा आमतौर पर शाम के समय प्रदोष काल में की जाती है। सबसे पहले प्रथम पूजनीय भगवान गणेश की पूजा शुरू करें। गणेश जी को कुमकुम और हल्दी का तिलक लगाएं। दूर्वा, पान के पत्ते, अक्षत, सुपारी, फूल, फल और भोग अर्पित करने के बाद दीपक जलाएं। अब मां लक्ष्मी की पूजा करें। देवी लक्ष्मी को कुमकुम लगाएं, लाल चुनरी चढ़ाएं, फल, फूल, भोग, अक्षत, कौड़ी, हल्दी की गांठ आदि अर्पित करने के बाद मंत्र जाप करते हुए पूजा पाठ करें। पूजा की प्रक्रिया अपनी पारिवारिक पंरपरा और रीति-रिवाजों के अनुसार करें। अगर दिवाली की पूजा में आपके घर पर सिक्के-नकद, आभूषण या हिसाब-किताब की किताबें रखी जाती हैं, तो उन्हें पूजा के दौरान देवी-देवता के सामने रखें।
दीपावली की पूजा के बाद मां लक्ष्मी की आरती करें। आरती करने से पहले आरती की थाली सजाएं। इसमें कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं। स्वास्तिक के ऊपर घी का दीपक रखें, फूल, अक्षत और कपूर रखें। अब थाली को दक्षिणावर्त घुमाते हुए मां लक्ष्मी की आरती करें। आरती के बाद पूजा संपन्न मानी जाती है। इसके बाद भगवान के सामने पूजा के दौरान हुई भूलचूक के लिए क्षमाप्रार्थना करें। अंत में परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों या पड़ोसियों में प्रसाद का वितरण करें।
दीपावली की परंपराएं और रीति-रिवाज वर्षों से चली आ रही हैं, जिसका पालन आज भी उसी तरह से किया जाता है। नीचे दिवाली की प्रमुख परंपराओं और रीति-रिवाजों और इसके कारणों के बारे में बताया जा रहा है।
दीप जलाना आध्यात्मिक दृष्टि से मानव शरीर का प्रतीक है। इसमें तेल व्यक्ति के नकारात्मक गुणों का प्रतिनिधित्व करता है, जो लोभ, लालच, क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार को जालाता है। लौ को दिव्य ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार दीपावली में दीप जलाना व्यक्ति के नकारात्मक गुणों को जलाकर नष्ट करने और उसके भीतर के सर्वोत्तम प्रकाश को प्रकट करने का प्रतीक है। दिवाली पर दीये जलाना सकारात्मकता से जुड़ी एक परंपरा है जो अंधकार को दूर भगाने का संकेत देती है।
दीपावली के दिन आमतौर पर प्रवेश द्वार के पास और पूजा स्थल के पास रंगोली बनाने की परंपरा है, जिसका पालन आज भी किया जाता है। रंगोली को शुभता का प्रतीक माना जाता है। प्राचीन समय में रंगोली चावल के आटे और चाक जैसी सामग्रियों से बनाई जाती थी। हालांकि अब रंगोली बनाने के लिए कई तरह के रंगों और यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। रंगोली बनाने से घर पर शुभता और सकारात्मकता बढ़ती है, रंगोली देखने वाले व्यक्ति के मन पर शांति का प्रभाव डालता है। साथ ही रंगोली बनाना देवी लक्ष्मी के घर पर आगमन,आर्थिक स्थिरता, सौभाग्य और धन-समृद्धि से जुड़ा है।
दीपावली शुरू होने के पहले से ही घर की साफ-सफाई का काम शुरू हो जाता है। इस समय लोग दीवारों पर पेंटिंग करवाते हैं, नए-नए पर्दे, बेडशीट और साज-सजावट के सामान लिए जाते हैं। दिवाली के लिए साफ-सुथरा और सजा हुआ घर तैयार होता है। मान्यता है कि दिवाली पर घर की साफ-सफाई, सजावट और अच्छी व्यवस्था से नए अवसरों और विचारों को आकर्षित करने का अवसर मिलता है।
दीपावली पर घर के बड़े-बुजुर्ग से लेकर बच्चे सभी लोगों के नए कपड़े पहनने की परंपरा है। इस परंपरा के पीछे यह मान्यता है कि, पुराने समय में नए कपड़े पहनने को पुनर्जन्म का प्रतीक माना जाता था, जो अतीत के आघात, भय, क्रोध, भावनात्मक बोझ और असफलताओं से मुक्ति का संकेत देता था। यही कारण है कि दीपावली के शुभ दिन पर लोग नए कपड़े पहनते हैं। नए कपड़े पहनना अतीत के दुःखों को त्यागने और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का प्रतीक है।
दीपावली उन त्योहारों में से एक है जिसमें उपहारों का आदान-प्रदान किया जाता है। इस दिन रिश्तेदार और आस-पड़ोस के लोगों में उपहारों का आदान-प्रदान किया जाता है। यह परंपरा रिश्ते को मजबूत बनाने, खुशियां बढ़ाने और तनावपूर्ण रिश्तों को सुधारने का एक अच्छा तरीका भी है। उपहारों का आदान-प्रदान प्रेम की भावना को बढ़ावा देता है और यह सुनिश्चित करता है कि त्योहार के दिन कोई भी अकेलापन महसूस न करे। उपहार के साथ लोग एक दूसरे को शुभ दीपावली कहकर इसकी बधाई और शुभकामनाएं भी देते हैं।
दीपावली पर्व से जुड़ी एक आम परंपरा है विभिन्न प्रकार की मिठाई बनाना। मेवे, घी, दूध, शक्कर और गुड़ से कई तरह की मिठाइयां बनाई जाती हैं। दीपावली पर मिठाई बनाने की परंपरा के अनुसार, जब घर पर मिठाई बनाई जाती है और इसे बाहर के लोगों में बांटा जाता है या अतिथियों को खिलाया जाता है तो इससे मन में द्वेष भावना समाप्त होती है और मिठाइयों की मिठास रिश्तों की कड़वाहट को दूर करती है। साथ ही इसमें मौजूद घी, मेवे, गुड़ जैसी चीजें को शारीरिक शक्ति बढ़ाने का साधन माना जाता है।
दीपावली पर आतिशबाजी करना इस त्योहार की एक प्रचलित परंपरा है। माना जाता है कि, जब भगवान राम, लक्ष्मण और देवी सीता अयोध्या लौटे थे, तब पूरे महल को फूल, रंगोली और दीपों से सजाया गया था, जिससे कि अमावस की अंधेरी रात में भी रोशनी की कमी न हो। लेकिन आधुनिक समय में इस भावना को व्यक्त करने, आनंदित और उल्लास के लिए लोग भगवान राम, भगवान लक्ष्मण और देवी सीता के स्वागत के उपलक्ष्य में आतिशबाजी करने लगे। इस प्रकार से दीपावली पर पटाखे जलाने की परंपरा प्राचीन नहीं है, बल्कि यह समय के साथ विकसित हुई है।
दीपावली के शुभ दिन कौन से काम करने चाहिए यह जानने के बाद यह जानना भी अति आवश्यक है कि, इस दिन किन कामों को करने से बचना चाहिए। यहां उन कामों के बारे में बताया जा रहा है, जिन्हें दीपावली के दिन आमतौर पर करना अच्छा नहीं माना जाता है।
A. दीपावली की धनलक्ष्मी पोटली में मुख्य रूप से लाल या पीले रंग के कपड़े में हल्दी, कौड़ी, गोमती चक्र, धनिया, कमलगट्टा, चांदी का सिक्का डाली जाती है।
A. नहीं, दिवाली के दिन पैसे दांव में जालकर ताश, जुआ या सट्टेबाजी को धार्मिक, नैतिक और कानूनी रूप से सही नहीं माना जाता है।
A. रविवार, 8 नवंबर 2026 को दीपावली का त्योहार मनाया जाएगा।
A. दीपावली पर दीपों की संख्या निश्चित नहीं है। आप अपनी श्रद्धानुसार कितने भी दीप जला सकते हैं। लेकिन शुभ कार्यों में विषम संख्या में दीप जलाना चाहिए।