करवा चौथ हिंदू धर्म का महत्वपूर्ण त्योहार है, जिसका महिलाओं को बेसब्री से इंतजार रहता है। करवा चौथ प्रेम और वैवाहिक जीवन का उत्सव है। इस दिन महिलाएं पति की दीर्घायु, समृद्धि, स्वस्थ जीवन और सुखमय वैवाहिक जीवन की कामना से सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं। यह केवल एक व्रत नहीं बल्कि अटूट प्रेम, विश्वास, बंधन और समर्पण को भी दर्शाता है। हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला करवा चौथ का व्रत हर साल अक्टूबर या नवंबर महीने में आता है।
यह ऐसा पवित्र दिन है जिसमें पूजा-पाठ और सभी कार्य रीति-रिवाज, परंपरा के अनुसार करने चाहिए। सरगी से लेकर व्रत रखने का तरीका, करवा चौथ की पूजा, चंद्रमा पूजन से लेकर व्रत खोलने का तरीका, सब कुछ निर्धारित नियमों के अनुसार करना चाहिए। आप चाहे विवाहित हों या विवाह योग्य हों, करवा चौथ के दिन व्रत रखते हैं तो इसकी तिथि, विधि और चंद्रोदय का सही समय जानना आपके लिए जरूरी है। अगर आप करवा चौथ व्रत से जुड़ी इन जानकारियों को विस्तारपूर्वक जानना चाहते हैं तो यहां पढ़ें-
करवा चौथ 2026 में गुरुवार 29 अक्टूबर को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर सुबह 1:06 पर लग जाएगी और रात 10:09 तक रहेगी। अधिक जानकारी के लिए नीचे दी गई तालिका पर देखें-
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आयोजन |
तिथि और मुहूर्त |
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करवा चौथ 2026 |
मंगलवार, 29 अक्टूबर 2026 |
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चतुर्थी तिथि आरंभ |
29 अक्टूबर सुबह 1:06 बजे |
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चतुर्थी तिथि समाप्त |
29 अक्टूबर रात 10:09 बजे |
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सूर्योदय का समय |
29 अक्टूबर सुबह 6:31 बजे |
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पूजा मुहूर्त |
29 अक्टूबर शाम 5:38 से 6:56 तक |
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चंद्रोदय का समय |
29 अक्टूबर लगभग रात 8:17 बजे |
नोट: करवा चौथ के व्रत-पूजन के लिए दिया गया यह समय नई दिल्ली के अनुसार है। आप अपने शहर के अनुसार सटीक समय जानने के लिए यहां आज का पंचांग देख सकते हैं।
अगर आप करवा चौथ व्रत के बारे में अंग्रेजी में पढ़ना चाहते हैं, तो Karwa Chauth 2026 पर क्लिक करें।
करवा चौथ हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण और पारंपरिक व्रत है, जिसे विशेषकर विवाहित महिलाएं मनाती हैं। इसे करक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। वैसे तो पूरे भारत में करवा चौथ मनाई जाती है, लेकिन विशेषकर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में इसकी रौनक रहती है।
इस दिन मुख्य रूप से महिलाएं पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए व्रत रखती हैं। मान्यता है कि करवा चौथ का त्योहार पति-पत्नी के रिश्ते में सौहार्द और प्रेम को बढ़ाता है, जिससे रिश्ता मजबूत होता है। व्रत की शुरुआत सरगी खाकर होती है। इसके बाद पूरे दिन निर्जला व्रत रखा जाता है, करवा माता की पूजा या शिव परिवार की पूजा की जाती है, करवा चौथ की व्रत कथा सुनी जाती है, शाम में चंद्रोदय होने के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर चंद्रमा की पूजा की जाती है और फिर व्रत खोला जाता है। अगर आप इन नियमों और विधियों के बारे में विस्तारपूर्वक जानना चाहते हैं तो यहां नीचे पढ़ें।
करवा चौथ के मौके पर आपने भी अपने आस-पास इस त्योहार के लिए महिलाओं में उत्साह देखा होगा, महिलाओं को सजते-संवरते और बेसब्री से चांद का इंतजार करते हुए देखा होगा। अगर हां, तो आपके मन में यह सवाल जरूर आया होगा कि, आखिर इसका क्या महत्व है? नीचे बताई गई निम्मलिखित बातें करवा चौथ के महत्व को स्पष्ट करती हैं।
पति की लंबी उम्र की प्रार्थना
करवा चौथ का व्रत रखने का मुख्य उद्देश्य पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करना है। इसलिए इस दिन महिलाएं शिव-पार्वती की पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। देवी पार्वती को सौभाग्य की देवी माना गया है और शिव जी के आशीर्वाद से अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। इसलिए करवा चौथ का व्रत प्रेम, सुखी वैवाहिक जीवन और अटूट बंधन का प्रतीक माना जाता है।
भक्ति और प्रेम का प्रतीक
करवा चौथ के दिन पत्नियां अपने पति के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। वहीं आधुनिक समय में पति भी पत्नियों के लिए व्रत रखते हैं या उपहार देते हैं। इस प्रकार यह पति-पत्नी के लिए ऐसा खास दिन बन जाता है, जब दोनों एक दूसरे के प्रयासों की सराहना करते हैं। इससे आपसी प्रेम बढ़ता है।
अनुशासन का महत्व
करवा चौथ व्रत में महिलाएं नियम और पूर्ण अनुशासन का पालन करते हुए पूरे दिन व्रत रखती हैं। पूरे दिन अन्न-जल का त्याग करना अनुशासन, संयम और समर्पण का महत्व सिखाता है।
सास-बहू के रिश्ते को मजबूत बनाता है
करवा चौथ का त्योहार सिर्फ पति-पत्नी के आपसी प्रेम को ही नहीं बढ़ाता, बल्कि सास-बहू के रिश्ते को भी मजबूत बनाता है। इस त्योहार में ऐसी कई परंपराएं हैं सास-बहू के रिश्ते को मजबूत बनाने का मुख्य कारण बनती हैं। इसमें सास द्वारा बहू को सरगी देना, उपहारों का आदान-प्रदान, शक्कर के करवे का महत्व और साथ मिलकर कथा सुनने से रिश्तों में जुड़ाव बढ़ता है।
सामुदायिक जुड़ाव
करवा चौथ के पावन दिन पर आस-पड़ोस की महिलाएं और सखियां शाम के समय पूजा के लिए एक स्थान पर एकत्रित होती हैं। सभी लाल, गुलाबी, हरे, मैरून जैसे चटक रंगों के कपड़े पहनी हैं और साज-श्रृंगार करती हैं। सभी एक साथ बैठकर कथा सुनती हैं और बारी-बारी से थाली घुमाती है। इस प्रकार करवा चौथ का यह दिन महिलाओं के बीच आपसी घनिष्ठता और मित्रता को बढ़ाने से सामुदायिक जुड़ाव का भी संदेश देता है।
करवा चौथ की पूजा सामग्री परिवार और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग होती है। हालांकि, सामान्य पूजा सामग्री में अधिक अंतर नहीं होता है। अगर आप जानना चाहते हैं कि करवा चौथ की पूजा के लिए कौन सी सामग्रियां महत्वपूर्ण होती हैं तो यहां नीचे कुछ चीजें बताई गई हैं, जो पूजा के लिए जरूरी हो सकती हैं।
करवा चौथ पूजा विधि भी स्थानीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। लेकिन करवा चौथ की पूजा करते समय पालन किए जाने वाले सामान्य चरण कुछ इस प्रकार हैं-
करवा चौथ में व्रत रखने से पहले सरगी करने की परंपरा है। आमतौर पर सास अपनी बहू को सरगी देती है। सरगी की थाली में नए वस्त्र, सुहाग का सामान, फल, मेवे और मिठाईयां जैसी चीजें होती हैं। सरगी करने के लिए सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और फिर पूजाघर में दीप जलाएं। सास द्वारा दी गई सरगी का सेवन करके करवा चौथ व्रत की शुरुआत करें।
जिस स्थान पर करवा चौथ की पूजा करनी हो, उस स्थान को साफ और शुद्ध कर लें। आप इस स्थान पर फूल-मालाओं से सजावट भी कर सकते हैं या रंगोली बना सकते हैं। पूजा स्थल के पास सभी सामग्रियों को रख दें और फिर शुभ मुहूर्त में पूजा की शुरुआत करें।
सबसे पहले एक आसन बिछाकर बैठ जाएं। एक चौकी स्थापित करें और फिर शिव परिवार की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। कई लोग इस दिन करवा माता की तस्वीर में भी पूजा करते हैं। आप अपनी पारिवारिक परंपरा का पालन करते हुए पूजा करें। माता पार्वती को सिंदूर, कुमकुम और सुहाग का सामान अर्पित करें। भगवान का भी तिलक करें और फल-फूल, मिठाई चढ़ाएं। इसके बाद घी का दीपक जलाएं और हाथ में फूल रखकर करवा चौथ की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। इसके बाद आरती करें। पूजा समाप्त होने के बाद चंद्रोदय होने का इंतजार करें।
पूजा और कथा के बाद कुछ परंपराओं में करवा की रस्म की जाती है। इसमें महिलाएं एक साथ बैठकर करवा का आदान-प्रदान करती हैं। आप करवा चौथ की व्रत कथा सुनने के बाद इस रस्म को कर सकते हैं। करवा घुमाते समय महिलाएं "ले सुहागन ले करवा, दे सुहागन दे करवा" बोलती हैं। आमतौर पर 7 बार करवा घुमाया जाता है।
करवा चौथ की पूजा समाप्त होने के बाद चंद्रमा की प्रतीक्षा करें। आकाश में चांद नजर आने के बाद दूध में जल मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें और फिर फूल अर्पित करें और दीपक जलाएं। इसके बाद छलनी से पहले चंद्रमा के दर्शन करें और फिर इसी छलनी से पति का चेहरा देखें। इसके बाद पति के हाथों से पानी पीकर अपना व्रत खोलें। ईश्वर से पति की लंबी आयु और सुखमय वैवाहिक जीवन की कामना करें।
करवा चौथ व्रत कथा इस अनुष्ठान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह एक पारंपरिक परंपरा और लोकप्रिय कथा है, जिसे महत्वपूर्ण माना जाता है। करवा चौथ की व्रत कथा नियमों का सतर्कता से पालन करने के लिए आगाह करती है, सामुदायिक एकता के महत्व को उजागर करती है, भक्ति और अनुशासन सिखाती है। करवा चौथ की लोकप्रिय कथाओं में से एक है वीरवती की है। आइए जानें इस कथा और इसके नैतिक संदेश के बारे में जिसे व्रत रखने वाली हर महिला को आत्मसात करना चाहिए।
करवा चौथ की प्रचलित व्रत कथा के अनुसार, एक साहूकार के सात लड़के और एक लड़की थी, जिसका नाम वीरवती था। सातों भाई अपनी बहन वीरवती से बहुत प्रेम करते थे। शादी के बाद वीरवती अपने मायके आई हुई थी। कार्तिक मास के कृष्ण की चतुर्थी तिथि को साहुकार की पत्नी समेत उसकी सातों बहुओं और बेटी वीरवती ने भी करवा चौथ का व्रत रखा। रात्रि के समय साहूकार के सभी लड़के भोजन करने बैठे तो उन्होंने अपनी बहन को भी भोजन करने को कहा। वीरवती ने कहा कि, भैया अभी चांद नहीं निकला है। चांद निकलने के बाद उसे अर्घ्य देकर ही मैं आज भोजन करूंगी। पहला व्रत होने के कारण वीरवती भूखी-प्यासी रहने से कमजोर हो गई थी।
भाइयों से बहन का यूं भूख से व्याकुल होना देखा नहीं गया। तब साहूकार के बेटे नगर के बाहर चले गए और वहां एक पेड़ पर चढ़कर दीपक जलाकर चंद्रमा जैसा कृत्रिम प्रकाश उत्पन्न किया। घर आकर उन्होंने अपनी बहन से कहा कि, देखो बहन चांद निकल आया है। अब तुम अर्घ्य देकर भोजन कर लो। वीरवती ने अपनी भाभियों से कहा कि, देखो चांद निकल आया है, आप लोग भी अर्घ्य देकर भोजन कर लें। ननद की बात सुनकर भाभियों ने कहा, बहन अभी चांद नहीं निकला है, तुम्हारे भाइयों ने धोखे से अग्नि जालकर उसके प्रकाश को चांद के रूप में तुम्हें दिखा दिया। लेकिन वीरवती भाइयों की बात में आ गई और भाभियों की बात पर भरोसा नहीं किया।
वीरवती ने दीपक के प्रकाश को चंद्रमा मानकर उसे अर्घ्य देकर पूजा-पाठ किया और फिर भोजन करने बैठ गई। इस प्रकार चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना भोजन कर लेने के कारण वीरवती का करवा चौथ व्रत खंडित हो गया। जैसे ही वीरवती भोजन करने बैठी तो पहले कौर भोजन में बाल निकला, दूसरे कौर में छींक आई और तीसरे कौर में ससुराल से उसे बुलावा आ गया। वीरवती जब ससुराल पहुंची को देखा कि उसके पति की मृत्यु हो चुकी थी। वीरवती बिलख-बिलख कर रोने लगी। वह तब तक रोती रही जब तक देवी प्रकट नहीं हुईं। देवी के प्रकट होने पर वीरवती ने उनसे क्षमा मांगी और कठोर अनुशासन और रीति-रिवाजों के साथ व्रत चतुर्थी का पालन किया। आखिरकार माता पार्वती ने उसकी प्रार्थना सुनी और उसके पति को पुनर्जीवित कर दिया। तभी से करवा चौथ व्रत को अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाने लगा। हे करवा माता जैसे आपने वीरवती के सुहाग की रक्षा की, वैसे भी सभी सुहागिनों के सुहाग की रक्षा करना।
नोट- करवा चौथ की इस कहानी का विवरण विभिन्न क्षेत्रों, परिवारों, परंपराओं या स्थानों में भिन्न हो सकता है।
A: हां, करवा चौथ का व्रत कुंवारी कन्याएं भी रखती हैं। व्रत रखकर वे मनचाहे या योग्य वर की कामना करती हैं।
A: सही नियम के अनुसार, किसी भी महत्वपूर्ण व्रत वाले दिन स्त्रियों को बाल नहीं धोने चाहिए। आप व्रत से एक दिन पूर्व बाल धो सकते हैं। हालांकि करवा चौथ व्रत में बाल धोने या न धोने का निर्णय आप अपनी पारिवारिक परंपरा के मुताबिक कर सकते हैं।
A: हां, आप घर पर दो करवे रखकर या माता की मूर्ति के सामने बैठकर भी करवा चौथ की पूजा कर सकते हैं।
A: करवा फेरते या बदलते समय "ले सुहागन ले करवा, दे सुहागन दे करवा।" बोला जाता है।