देवउठनी एकादशी 2026
शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 · शुक्ल पक्ष, एकादशी तिथि — विष्णु जागते हैं — चातुर्मास समाप्त, विवाह पुनः आरंभ.
व्रत एवं पारण का समय
एकादशी तिथि भर व्रत रखा जाता है और अगली सुबह द्वादशी पर पारण समय-सीमा में तोड़ा जाता है। नीचे दिए समय नई दिल्ली के लिए हैं और अनुमानित हैं — अपने शहर के लिए पंचांग से सटीक तिथि और पारण की पुष्टि करें।

देवउठनी एकादशी
शुक्रवार, 20 नवंबर 2026
समय नई दिल्ली के लिए हैं और आपके स्थान के अनुसार बदलते हैं। आज का पंचांग देखें अपने शहर के लिए।
व्रत कैसे रखें
प्रातःकालीन संकल्प से लेकर द्वादशी पर पारण तक — चार सरल चरण।
ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान करें और शुद्ध एवं स्थिर मन से व्रत का संकल्प लें।
तुलसी, पुष्प, धूप और घी के दीपक से भगवान विष्णु की पूजा करें; फल और पंचामृत अर्पित करें।
अन्न और दालों का त्याग करें। दिन भर जप, कथा और दान में लगे रहें और रात्रि जागरण करें।
द्वादशी की प्रातःकाल में निर्धारित समय-सीमा के भीतर, दीन-दुखियों को भोजन कराने के बाद व्रत तोड़ें।
व्रत तभी पूर्ण होता है जब इसे सही ढंग से तोड़ा जाए: द्वादशी तिथि पर, पारण समय-सीमा में और एकादशी समाप्त होने के बाद। 2026 में देवउठनी एकादशी का पारण शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 की अगली सुबह, नई दिल्ली में पड़ता है।
देव उठनी एकादशी, जिसे देवोत्थान एकादशी या देव प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इसे हिंदू धर्म में पड़ने वाली सभी एकादशियों में अधिक महत्वपूर्ण व्रत माना गया है। देवउठनी एकादशी (devuthani gyaras) भगवान विष्णु को समर्पित कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी है, जो चार माह के योगनिद्रा के बाद भगवान विष्णु के जागृत होने (जागने) का प्रतीक है।
देवउठनी एकादशी के दिन से चार माह के चातुर्मास की समाप्ति होती है और सभी शुभ-मांगलिक कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं। हालांकि यह देवउठनी एकादशी का एक संक्षिप्त परिचय है। यदि आप जानना चाहते हैं कि, देवउठनी एकादशी 2026 में कब पड़ रही है, इस व्रत का क्या महत्व है, इस एकादशी की पूजा विधि और व्रत कथा क्या है तो नीचे इसके बारे में विस्तारपूर्वक बताया जा रहा है।
देवउठनी एकादशी 2026 कब है?
देवउठनी एकादशी का व्रत शुक्रवार 20 नवंबर, 2026 को कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि (एकादशी) को रखा जाएगा। देवउठनी एकादशी से संबंधित अधिक जानकारी के लिए नीचे दी गई तालिका में देखें।
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व्रत का विवरण |
तिथि और मुहूर्त |
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देवउठनी एकादशी |
शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 |
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कार्तिक शुक्ल एकादशी तिथि आरंभ |
20 नवंबर, सुबह 7:15 बजे |
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कार्तिक शुक्ल एकादशी तिथि समाप्त |
21 नवंबर, सुबह 6:31 बजे तक |
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पारण का समय |
21 नवंबर, दोपहर 1:11 बजे से 3:18 बजे तक |
नोट: ऊपर तालिका में बताया गया मुहूर्त नई दिल्ली के समय के अनुसार है। आप सटीक मुहूर्त के लिए अपने शहर का आज का पंचांग देख सकते हैं।
देवउठनी एकादशी क्या है?
देवउठनी एकादशी कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली महत्वपूर्ण एकादशी है। देव शब्द भगवान विष्णु को संदर्भित करता है और उठना उनके जागरण को दर्शाता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, देवउठनी एकादशी का दिन चतुर्मास के समापन से जुड़ा है। भगवान विष्णु के चार माह के बाद योगनिद्रा से जागते ही उत्सव, मांगलिक कार्य और आध्यात्मिक वातारण की पुन: शुरुआत होती है। देवउठनी एकादशी का आगामी दिन तुलसी विवाह से जुड़ा है,जिसमें पवित्र तुलसी के पौधे का भगवान विष्णु के स्वरूप शालीग्राम के साथ औपचारिक विवाह होता है।
20 या 21 नवंबर,देवउठनी एकादशी व्रत कब है?
देवउठनी एकादशी व्रत की तिथि को लेकर असमंजस की स्थिति है और इसका कारण मुहूर्त है। दरअसल एकादशी का व्रत उदयातिथि के आधार पर रखा जाता है। 20 नवंबर को एकादशी तिथि सूर्योदय के बाद शुरू हो रही है। इसलिए कई लोग 21 नवंबर को एकादशी का व्रत रखेंगे।
स्मार्त परंपरा के अनुसार, 20 नवंबर को देवउठनी एकादशी व्रत रखा जाएगा, जबकि कुछ वैष्णव परंपराओं में और उदयातिथि के आधार पर 21 नवंबर को व्रत रखा जाएगा। यदि आप 20 नवंबर को व्रत रख रहे हैं तो 21 नवंबर को दोपहर 1:11 बजे के बाद ही व्रत का पारण करें, क्योंकि दोपहर 12:07 बजे तक हरि वासर रहेगा, जिसमें व्रत नहीं खोला जाता है। वहीं यदि आप 21 नवंबर को व्रत रखते हैं तो 22 नवंबर को सुबह 06:49 से 08:56 के बीच व्रत का पारण कर सकते हैं।
यदि आप देवउठनी एकादशी के बारे में अंग्रेजी में पढ़ना चाहते हैं, तो devutthana ekadashi पर क्लिक करें
देवउठनी एकादशी का क्या महत्व है?
देवउठनी एकादशी का महत्व मुख्य रूप से भगवान विष्णु के चार महीने के योग निद्रा से जागृत होने और चतुर्मास के अंत से जुड़ा है। इस एकादशी के अन्य विभिन्न महत्व हैं, जो इस प्रकार हैं-
भगवान विष्णु का जागरण
हिंदू मान्यता के अनुसार, देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु योग निद्रा से जागृत होते हैं। यह चार महीने के चतुर्मास की समाप्ति का प्रतीक है और आध्यात्मिक जागृति से जुड़ा है। इस अवसर पर देवउठनी एकादशी मनाई जाती है, भक्त व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और आध्यात्मिक गतिविधियों में संलग्न होते हैं।
मांगलिक कार्यों की पुनः शुरुआत
देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में विश्राम के लिए चले जाते हैं और चार माह तक विश्राम करते हैं। इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। चातुर्मास के दौरान चार महीने तक शुभ मांगलिक कार्य जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश आदि वर्जित होते हैं। लेकिन देवउठनी एकादशी वह अवसर होता है,जब भगवान के जागते ही फिर से शुभ-मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है।
तुलसी विवाह
देवउठनी एकादशी का तुलसी विवाह से भी गहरा संबंध है। मान्यता है कि, देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागने के अगले दिन सबसे पहले उनके शीलग्राम स्वरूप से साथ तुलसी के पौधे का प्रतीकात्मक रूप से विवाह संपन्न कराया जाता है। यह पवित्रता और दिव्य मिलन का प्रतीक है।
देवउठनी एकादशी व्रत विधि
देवउठनी एकादशी का व्रत भगवान विष्णु के प्रति भक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में भक्तों द्वारा रखा जाने वाला अनुष्ठान है। धार्मिक परंपरा, शारीरिक क्षमता और अनुशासन ही यह निर्धारित करते हैं कि भक्त उपवास के लिए कौन सी विधि का चयन करते हैं। व्रत कई प्रकार के होते हैं और हर भक्त के लिए व्रत रखने का तरीका भी अलग होता है। आप व्रत का पालन कैसे करते हैं, यह पूरी तरह से आपकी श्रद्धा और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। यहां देवउठनी एकादशी पर किए जाने वाले कुछ सामान्य व्रतों के बारे में बताया गया है।
निर्जला व्रत
निर्जला व्रत में सूर्योदय से लेकर अगले सूर्योदय तक अन्न-जल का सेवन वर्जित होता है। सभी व्रतों में निर्जला व्रत को सबसे कठिन व्रत माना जाता है, इसलिए हर व्यक्ति के लिए इस व्रत का पालन करना आसान नहीं होता है। सबसे ज्यादा कठिन व्रत रखने की होड़ या आध्यात्मिक भक्ति का प्रतीक होने के कारण निर्जला व्रत रखने का संकल्प लेकर अपने स्वास्थ्य को खतरे में नहीं डालना चाहिए। यदि आप शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं, तभी निर्जला व्रत का संकल्प लेना चाहिए। क्योंकि व्रत का संकल्प लेकर उसे बीच में तोड़ देने से व्रत का लाभ नहीं मिलता।
फलाहार व्रत
देवउठनी एकादशी का व्रत भक्त फलाहार भी रख सकते हैं। इस दौरान पानी पीने और अनुमत फल खाने की छूट रहती है। लेकिन इस प्रकार के व्रत अन्न का सेवन या नियमित भोजन का सेवन वर्जित होता है।
सीमित या एक बार भोजन
एकादशी व्रत का तीसरा रूप प्रतिबंधित उपवास है, इसमें भक्त पूरे दिन में एक बार भोजन कर सकता है। आमतौर पर शाम की पूजा के बाद भोजन करने का विधान है। इस उपवास में चावल, आटा या ऐसे खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए जो उपवास के दिनों में वर्जित होते हैं। हालांकि आप व्रत में आलू, साबूदाना, सिंघाड़ा और मेवे आदि खा सकते हैं।
देवउठनी एकादशी पूजा सामग्री
देवउठनी एकादशी की पूजा के लिए यह जरूरी है कि, पूजा स्थल पर संबंधित सभी सामग्रियां एकत्रित रहे। इसलिए, यहां पूजा से जुड़ी कुछ आवश्यक और बुनियादी सामग्रियों की सूची दी गई है। लेकिन अलग-अलग रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार सामग्रियों में अंतर हो सकता है।
- भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर
- पूजा के लिए फूल
- मौसमी फल
- दीपक, बाती, घी और माचिस
- कुमकुम, रोली, पीला चंद
- कलश
- वेदी या लकड़ी की चौकी
- चौकी पर बिछाने के लिए कपड़ा
- शुद्ध जल
- भोग, मिठाई
- तुलसी के पत्ते
- देवउठनी एकादशी व्रत कथा की पुस्तक
देवउठनी एकादशी पूजा विधि
देवउठनी एकादशी की पूजा विधि पारिवारिक परंपराओं में भिन्न-भिन्न होती है। लेकिन रीति-रिवाज के आधार पर यहां पूजा के लिए सबसे सरल विधि बताई जा रही है, जिसका पालन कर आप देवउठनी एकादशी की पूजा कर सकते हैं।
स्नान और संकल्प
एकादशी पर दिन की शुरुआत सुबह जल्दी उठकर स्नान करके करें। नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें। क्योंकि व्रत-त्योहार में किए स्नान का मुख्य उद्देश्य केवल शारीरिक सफाई नहीं बल्कि मानसिक शु्द्धि भी है। स्नान के बाद साफ कपड़े पहनें। इस दिन काले-नीले या गहरे रंग के बजाय पीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ होता है। आप लाल, हरा और गुलाबी जैसे रंगों का भी चयन कर सकते हैं। स्नान और वस्त्र धारण करने के बाद पूजाघर में भगवान के सामने हाथ जोड़कर व्रत का संकल्प लें।
मूर्ति स्थापना
संकल्प लेने के बाद शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु की पूजा करें। सबसे पहले जिस स्थान पर पूजा करनी है, वहां की साफ-सफाई कर लें। अब एक लकड़ी की चौकी स्थापित कर उस पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। भगवान को पीले रंग के नए वस्त्र पहनाएं, पीले चंदन का तिलक लगाएं।
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फूल और भोग अर्पित करें
फूल, भोग, फल, तुलसी के पत्ते, नैवेद्य आदि अर्पित करने के बाद धूप-दीप जलाएं। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी के पत्ते जरूर चढ़ाएं, क्योंकि इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।
मंत्र जाप, कथा पाठ और आरती
अब भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। आप “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ” या “ॐ नमो नारायणाय” जैसे मंत्रों का उच्चारण कर सकते हैं। इसके बाद देवउठनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। आखिर में आरती करके पूजा का समापन करें। पूरे दिन भगवान के नामों का स्मरण करते रहें और अगले दिन व्रत का पारण करें।
देवउठनी एकादशी व्रत कथा
एक राज्य में प्रतापी राजा राज्य करता था। भगवान विष्णु के प्रति उसकी अटूट भक्ति थी। राजा के आदेश पर उस राज्य के सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे। एकादशी के दिन राज्य में कोई भी व्यक्ति अन्न नहीं खाता था। यहां तक कि नौकर-चाकर से लेकर पशुओं को भी एकादशी के दिन अन्न नहीं दिया जाता था, सभी फलाहार पर रहते थे।
एक बार दूसरे राज्य का एक व्यक्ति राजा के पास नौकरी के लिए आया। उसने राजा से नौकरी पर रखने की विनती की। राजा ने उसे काम पर रख लिया और एक शर्त रखी कि तुम्हें हर दिन भोजन पकाने के लिए चावल, आटा और दाल आदि जैसे खाद्य पदार्थ मिलेंगे, लेकिन एकादशी के दिन अन्न नहीं दिया जाएगा, सिर्फ फलाहार मिलेगा। व्यक्ति ने हां कर दी। व्यक्ति अपना काम करने लगा और कुछ दिनों बाद एकादशी का दिन आया। भोजन के समय उसे फल दिए गए। फल खाकर कुछ समय के लिए उसकी भूख शांत हो गई। लेकिन बाद में वह भूख से व्याकुल हो गया और अन्न के लिए गिड़गिड़ाने लगा। उसने राजा से कहा कि, महाराज फल से मेरा पेट नहीं भरेगा, मुझे भोजन पकाने के लिए अन्न चाहिए। राजा ने उसे नियम याद दिलाया। लेकिन व्यक्ति अन्न के लिए हठ करने लगा। आखिरकार राजा ने उसे अन्न दे दिया। व्यक्ति नित्य की तरह नदी के किनारे पहुंचा और स्नान करने के बाद भोजन पकाने लगा। भोजन बन जाने के बाद उसने भगवान को बुलाया। उसके बुलाने पर भगवान भी पहुंचे और प्रेमपूर्वक भोजन करके अंतर्धान हो गए।
पंद्रह दिन बाद फिर से एकादशी का दिन आया। व्यक्ति ने इस बार राजा से कहा कि महाराज, मुझे दोगुना अन्न चाहिए। क्योंकि उस दिन मैं भूखा ही रहा। जब राजा ने इसका कारण पूछा तो, व्यक्ति के कहा कि, मेरे साथ भगवान भी खाते हैं, इसलिए इतना सामान पूरा नहीं होता। राजा को आश्चर्य हुआ। उसने कहा कि मैं तुम्हारी बात नहीं मान सकता। मैं और राज्य के सभी लोग एकादशी का व्रत रखते हैं और पूजा करते हैं। मुझे कभी भगवान के दर्शन नहीं हुए।
राजा ने व्यक्ति को दोगुना अन्न दे दिया और एक पेड़ के पीछे छिपकर उसे देखता रहा। व्यक्ति ने हमेशा की तरह स्नान किया और फिर भोजन पकाया। जब भोजन तैयार हो गया तो उसने भगवान को बुलाया, लेकिन भगवान नहीं आए। आखिरकार उसने कहा कि भगवान, यदि आप नहीं आए तो मैं इसी नदी में कूदकर अपने प्राण त्याग दूंगा। फिर भी भगवान नहीं आए तो व्यक्ति प्राण त्यागने के लिए नदी की ओर बढ़ने लगा। तब पीताम्बर धारण किए चतुर्भुज रूप में भगवान प्रकट हुए और उसे रोक लिया और फिर उसके साथ बैठकर भोजन किया। भोजन के बाद भगवान अपने धाम लौट गए। यह सब देख राजा को यह ज्ञान मिला कि व्रत-उपवास का लाभ तब तक नहीं मिलता, जब तक मन शुद्ध न हो।
उसने कहा कि यदि अन्न नहीं दिया गया तो मैं भूख के मारे प्राण त्याग दूंगा। लेकिन राजा अपने धर्म और नियमों पर अडिग रहा। आखिरकार व्यक्ति नदी किनारे अपने प्राण त्यागने के लिए चला गया। व्यक्ति का दृढ़ निश्चय देख भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए और उसे रोक लिया। भगवान ने उसे अपने विमान में बिठाकर अपने धाम भेज दिया। इससे यह संदेश मिलता है कि सच्चे मन और दृढ़निश्चय से किया गया व्रत और धर्म का पालन हमेशा कल्याणकारी होता है।
देवउठनी एकादशी के दिन क्या करें और क्या नहीं?
क्या करें?
- देवउठनी एकादशी के दिन अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार व्रत रखें।
- भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करें।
- देवउठनी एकादशी की पूजा में भगवान को तुलसी के पत्ते जरूर चढ़ाएं।
- व्रत के दौरान शांतिपूर्ण और भक्तिमय दिनचर्या बनाए रखें।
- द्वादशी तिथि पर निर्धारित समय में व्रत का पारण करें।
- एकादशी व्रत का पारण करने से पहले ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा अवश्य दें।
- द्वादशी तिथि पर पारण के दिन चावल का सेवन करना शुभ माना जाता है।
क्या नहीं करें?
- देवउठनी एकादशी के व्रत में अनाज और दालों के सेवन से परहेज करना चाहिए।
- व्रत के दौरान व्यक्ति को भोग-विलास से जुड़ी चीजों से दूर रहना चाहिए।
- एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। पूजा में चढ़ाने के लिए आप एक दिन पूर्व ही पत्ते तोड़कर रख लें।
- व्रत रखकर क्रोध, विवाद, चुगली या झगड़ा नहीं करना चाहिए।
- एकादशी के दिन व्रत रखकर बाल कटवाने और नाखून काटने से भी बचना चाहिए।
- कुछ मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन बालों को साबुन या शैम्पू से धोना भी वर्जित माना जाता है।
- देवउठनी एकादशी पर चावल का सेवन नहीं करना चाहिए।
- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर समाप्त होने और सूर्योदय के बाद ही करना चाहिए।
