इंदिरा एकादशी 2026
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 · कृष्ण पक्ष, एकादशी तिथि — पूर्वजों की आत्मा को मुक्ति देता है.
व्रत एवं पारण का समय
एकादशी तिथि भर व्रत रखा जाता है और अगली सुबह द्वादशी पर पारण समय-सीमा में तोड़ा जाता है। नीचे दिए समय नई दिल्ली के लिए हैं और अनुमानित हैं — अपने शहर के लिए पंचांग से सटीक तिथि और पारण की पुष्टि करें।

इंदिरा एकादशी
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026
समय नई दिल्ली के लिए हैं और आपके स्थान के अनुसार बदलते हैं। आज का पंचांग देखें अपने शहर के लिए।
व्रत कैसे रखें
प्रातःकालीन संकल्प से लेकर द्वादशी पर पारण तक — चार सरल चरण।
ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान करें और शुद्ध एवं स्थिर मन से व्रत का संकल्प लें।
तुलसी, पुष्प, धूप और घी के दीपक से भगवान विष्णु की पूजा करें; फल और पंचामृत अर्पित करें।
अन्न और दालों का त्याग करें। दिन भर जप, कथा और दान में लगे रहें और रात्रि जागरण करें।
द्वादशी की प्रातःकाल में निर्धारित समय-सीमा के भीतर, दीन-दुखियों को भोजन कराने के बाद व्रत तोड़ें।
व्रत तभी पूर्ण होता है जब इसे सही ढंग से तोड़ा जाए: द्वादशी तिथि पर, पारण समय-सीमा में और एकादशी समाप्त होने के बाद। 2026 में इंदिरा एकादशी का पारण मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 की अगली सुबह, नई दिल्ली में पड़ता है।
इंदिरा एकादशी आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि में पड़ती है। यह एकादशी भगवान विष्णु के साथ-साथ पितरों की पूजा के लिए भी समर्पित है। इंदिरा एकादशी भगवान विष्णु की पूजा, पूर्वजों का स्मरण और उनकी शांति के लिए प्रार्थना और उपवास से जुड़ी है। इसलिए इंदिरा एकादशी को पितरों की मुक्ति का महाव्रत कहा जाता है। साथ ही इंदिरा एकादशी को आध्यात्मिक शुद्धि का भी दिन माना जाता है। लेकिन इंदिरा एकादशी व्रत का महत्व इससे कहीं अधिक है। यदि आप इंदिरा एकादशी का व्रत रखने वाले हैं और इसके बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं जैसे- इंदिरा एकादशी कब है, तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत के नियम और पारण? अगर हां तो यहां आपको एक ही जगह पर इंदिरा एकादशी व्रत से जुड़ी सभी जानकारियां प्राप्त होंगी।
इंदिरा एकादशी 2026 कब है?
पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाने वाले इंदिरा एकादशी व्रत इस वर्ष मंगलवार 6 अक्टूबर 2026 को पड़ रहा है। एकादशी तिथि 6 अक्टूबर को सुबह 2:07 पर लग जाएगी और 7 अक्टूबर को रात 12:34 बजे तक रहेगी। वहीं पारण द्वादशी तिथि पर 7 अक्टूबर को किया जाएगा। जानें मुहूर्त-
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इंदिरा एकादशी |
तिथि और मुहूर्त |
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इंदिरा एकादशी व्रत |
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 |
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एकादशी तिथि आरंभ |
6 अक्टूबर, सुबह 2:07 बजे |
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एकादशी तिथि समाप्त |
7 अक्टूबर, रात 12:34 बजे |
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इंदिरा एकादशी पूजा मुहूर्त |
सर्वार्थ सिद्धि योग (सुबह 6:17 से रात 10:17), अभिजीत मुहूर्त (सुबह 11:46 से दोपहर 12:33) |
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इंदिरा एकादशी व्रत पारण तिथि |
बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 |
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इंदिरा एकादशी व्रत पारण समय |
7 अक्टूबर सुबह 6:17 से 8:38 बजे तक |
नोट: इंदिरा एकादशी व्रत पारण का समय नई दिल्ली के अनुसार है। आप अपने शहर के अनुसार सटीक समय जानने के लिए यहां पंचांग देख सकते हैं।
अगर आप इंदिरा एकादशी व्रत के बारे में अंग्रेजी में पढ़ना चाहते हैं, तो Indira Ekadashi पर देख सकते हैं।
इंदिरा एकादशी का धार्मिक महत्व
इंदिरा एकादशी पितृ पक्ष के दौरान मनाई जाने वाली महत्वपूर्ण एकादशी है, जो कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि में पड़ती है और भगवान विष्णु को समर्पित है। यह एकादशी पितरों का स्मरण कराती है। मान्यता है कि, इंदिरा एकादशी पर व्रत रखने, पितरों की पूजा करने, तर्पण और दान-पुण्य जैसे कार्य करने से श्रीहरि के साथ ही पितरों की कृपा भी प्राप्त होती है। इंदिरा एकादशी के महत्व को विस्तारपूर्वक समझने के लिए यहां दिए गए कुछ बिंदुओं को देखें-
व्रत और आत्म-नियंत्रण
सभी व्रतों की तरह इंदिरा एकादशी का व्रत भी अनुशासित जीवन जीना और दैनिक खान-पान पर नियंत्रण रखना सिखाता है। इंदिरा एकादशी पर व्रत से पहले दशमी तिथि पर सात्विक भोजन करने, एकादशी तिथि पर व्रत नियमों का पालन करने और द्वादशी तिथि पर सूर्योदय के बाद व्रत खोलने के महत्व पर जोर दिया जाता है। इस प्रकार एकादशी का व्रत शरीर को उसकी क्षमतानुसार ही भोजन ग्रहण करना सिखाता है।
पूर्वजों की स्मृति
इंदिरा एकादशी को भगवान विष्णु के साथ ही पितृ पूजन के लिए भी महत्वपूर्ण दिन माना गया है। व्रत कथा के अनुसार राजा इंद्रसेन के पिता यमलोक में कष्ट भोग रहे थे। इंद्रसेन को जब इसका पता चला तो उन्होंने अपने पिता को मोक्ष दिलाने के लिए पूरी श्रद्धा से इंदिरा एकादशी का व्रत रखा। इंदिरा एकादशी का महत्व पूर्वजों को याद करना और उनकी आत्मा की शांति व मुक्ति के लिए प्रार्थना करना है।
पितृ दोष निवारण
मान्यता है कि, पितृ दोष पूर्वजों के कर्मों के अनुसार वंशजों में भी प्रवाहित होता है। पितृ दोष के कारण परिवार में बाधाएं और रुकावटें आती हैं। आर्थिक समस्याएं दुर्भाग्य और अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। पितृ दोष को दूर करने के लिए भी इंदिरा एकादशी का व्रत फलदायी होता है।
आध्यात्मिक शुद्धि
इंदिरा एकादशी न सिर्फ भगवान विष्णु और पितृ पूजन का दिन होता है, बल्कि यह आध्यात्मिक शुद्धि का भी दिन होता है। इस तिथि पर किया गया अनुष्ठान व्यक्ति के समस्त पाप कर्मों और शारीरिक विकार को दूर करता है। व्रत में अन्न त्याग और सात्विक चिंतन से मन की चंचलता शांत होती है और आंतरिक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।
इंदिरा एकादशी व्रत विधि
अगर आप इंदिरा एकादशी का व्रत रखना चाहते हैं और आप व्रत विधि या पूजा विधि के बारे में नहीं जानते हैं तो यहां विस्तारपूर्वक विधि बताई गई है, जिनका पालन कर आप अपना व्रत-पूजन पूजा कर सकते हैं। हालांकि, पारिवारिक परंपराओं, क्षेत्रों और रीति-रिवाज के अनुसार विधि में कुछ भिन्नता हो सकती है।
दशमी तिथि व्रत तैयारी: परंपरागत रूप से एकादशी व्रत की तैयारी और नियम की शुरुआत दशमी तिथि से ही हो जाती है। दशमी तिथि पर सूर्यास्त के समय ही भोजन कर लेना चाहिए। दशमी के दिन मांसाहार भोजन और लहसुन-प्याज युक्त भोजन नहीं करना चाहिए। भोजन और आचरण दोनों में सात्विकता बनाए रखें।
इंदिरा एकादशी पूजा विधि
स्नान और संकल्प
इंदिरा एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहन लें। इस दिन पीला, लाल, गुलाबी जैसे शुभ रंगों के कपड़े पहनने चाहिए। स्नान के बाद पूजाघर में घी का दीपक जलाएं और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत (निर्जला, जलाहार या निराहार) का संकल्प लें।
चौकी स्थापना
जिस स्थान पर पूजा करनी हो, उस स्थान की साफ-सफाई कर लें और गंगाजल छिड़कें। अब एक लकड़ी की चौकी स्थापित करें। चौकी के ऊपर पीले रंग का कपड़ा बिछाएं। अब इसमें भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। इंदिरा एकादशी विशेषरूप से भगवान विष्णु के शालीग्राम रूप की पूजा की जाती है।
पूजा सामग्री
पीले रंग के फूल, तुलसी का पत्ता, धूप, दीप, मिष्ठान, पीला चंदन, पीले वस्त्र, फल, नैवेद्य आदि। पितृपक्ष में पड़ने के कारण इस एकादशी पर भगवान विष्णु को काला तिल अर्पित करना भी शुभ होता है।
पूजा विधि
शालीग्राम को पंचामृत से स्नान कराएं। भगवान को पीले रंग के वस्त्र पहनाएं और चंदन का तिलक लगाएं। इसके बाद फूल, फल, तुलसी समेत सभी पूजा सामग्रियां अर्पित कर दें। फिर भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें, व्रत कथा का पाठ करें और आखिर में आरती के साथ पूजा संपन्न करें। लेकिन व्रत नियमों का पलन पूरे दिन जारी रखें।
पितृ पूजन
आश्विन कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी पर भगवान विष्णु के साथ ही पितरों की पूजा का भी महत्व होता है। पितृ पूजन, तर्पण या श्राद्ध के लिए कुतुप काल को सबसे उत्तम समय माना जाता है। यह लगभग सुबह 11:30 से दोपहर 12:30 बजे के बीच माना जाता है। इंदिरा एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद द्वादशी तिथि में पितरों की पूजा, श्राद्ध या तर्पण कर सकते हैं।
इंदिरा एकादशी व्रत के नियम
इंदिरा एकादशी का व्रत आप अपने शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के आधार पर रख सकते हैं। इंदिरा एकादशी का व्रत सामान्यतः पाँच प्रकार से रखा जा सकता है। नीचे दी गई तालीका के आधार पर आप व्रत के प्रकार और उससे जुड़े खाद्य पदार्थों के बारे में जान सकते हैं। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि, परिवार, क्षेत्र, परंपरा और गुरुओं के निर्देशों के अनुसार खान-पान के नियमों में कुछ अंतर हो सकता है।
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व्रत के प्रकार |
सेवन योग्य खाद्य पदार्थ |
निषिद्ध चीजें |
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निर्जला व्रत |
कुछ भी नहीं |
जल समेत सभी चीजें |
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जलाहार व्रत |
पानी और नारियल पानी |
ठोस आहार, फलियां, अनाज और अन्य खाद्य पदार्थ |
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क्षीरभोजी/दूध से बनी चीजें |
दूध से बनी सभी चीजें |
फल, सब्जियां और ठोस अनाज |
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फलाहार व्रत |
सभी तरह के फल और मेवे |
अनाज, फलियां और सब्जियां |
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नक्तभोजी व्रत |
सिर्फ एक समय सात्विक भोजन (सूर्यास्त के बाद) |
ठोस अनाज, दालें और सामान्य नमक |
अन्य जरूरी नियम
एकादशी व्रत में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए के अलावा भी व्रत रखने वाले जातकों को कुछ अन्य नियमों का पालन करना जरूरी होता है। क्योंकि एकादशी व्रत का अर्थ केवल अन्न-जल का त्याग कर भूखा रहना मात्र नहीं हैं, बल्कि इस व्रत में जातक का मन-वचन और कर्म से भी शुद्ध होना जरूरी होता है। इसलिए व्रत के इन नियमों पर भी गौर करें-
- व्रत के दौरान मनुष्य को अपनी इंद्रियों को शांत रखना चाहिए। इस समय लोभ, लालच, मन में बुरे विचार लाने और वाद-विवाद में न पड़ें।
- इंदिरा एकादशी के दिन जब भी समय मिले हरि नाम का जप करें और अधिक से अधिक समय ध्यान में बिताएं।
- व्रत वाले दिन पवित्र ग्रथों का पाठ करना या सुनना चाहिए। इस समय मंत्र जाप या पाठ पूरे दिन में कभी भी कर सकते हैं।
- इंदिरा एकादशी का व्रत रखने वाले जातकों को पूजा-पाठ के साथ ही दान-पुण्य जैसे कार्यों में भी भाग लेना चाहिए। इसलिए अपनी क्षमतानुसार गरीबों और जरूरतमंदों में श्रद्धाभाव से दान करें।
इंदिरा एकादशी व्रत की पौराणिक कथा
धर्मराज युधिष्ठिर ने कृष्ण से कहा- हे कृष्ण! आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और व्रत की विधि क्या है, कृपया मुझे बताइए। तब भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा- इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। यह पापों का नाश करने और पितरों को अधोगति से मुक्ति दिलाने वाली है। हे राजन! तुम ध्यानपूर्वक इसकी कथा सुनो।
प्राचीन समय में महिष्मति नगरी में इंद्रसेन नामक एक प्रतापी राजा राज करता था। इंद्रसेन की प्रजा भी उससे प्रसन्न रहती थी और नगर में शांति और खुशहाली थी। इंद्रसेन भी पुत्र, पौत्र और धन-संपत्ति से संपन्न था। वह भगवान विष्णु का परम भक्त था। एक दिन इंद्रसेन जब सभा में था, तब आकाश मार्ग से महर्षि नारद मुनि आए। मुनि ने राजा से पूछा, हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? आपकी बुद्धि और मन विष्णु भक्ति में लगे रहते हैं? मुनि के मुख से ऐसी बात सुनकर राजा ने कहा- हे महर्षि! प्रभु कृपा से सब कुशल है। आप कृपया अपने आगमन का कारण बताएं। तब मुनि ने कहा—मेरे वचनों को ध्यानपूर्वक सुनो। मैं एक समय यमलोक गया था। वहां सभा में मैंने तुम्हारे पिता को देखा, जो एकादशी व्रत भंग होने के कारण यमलोक का कष्ट भोग रहे हैं। उन्होंने संदेश दिया है कि, तुम आश्विन कृष्ण की इंदिरा एकादशी का व्रत पिता के निमित्त क रो, जिससे उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हो सके। महर्षि नारद के कथनानुसार राजा ने मृत पिता की मोक्ष हेतु इंदिरा एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से पिता को स्वर्गलोक में स्थान प्राप्त हुआ।
हे युधिष्ठिर! मैंने तुम्हें इंदिरा एकादशी व्रत का माहात्म्य बताया। इससे पठन या श्रवण करने से मनुष्य को सारे पाप खत्म होते हैं और मनुष्य जीवन में सभी सुखों का भोग कर मृत्यु के बाद बैकुंठ को प्राप्त होता है।
इंदिरा एकादशी कथा का नैतिक संदेश
- माता-पिता के प्रति दायित्व उनकी मृत्यु के बाद समाप्त नहीं होता। पितृ धर्म वह सिद्धांत हैं, जिसका उन्हें हमेशा पालन करना चाहिए।
- सच्ची श्रद्धा, भक्ति और उपवास से समर्पण की शक्ति अतीत के कर्मों और पापों को भी शुद्ध करने में सहायक होती है।
- आध्यात्मित कार्यों में सच्चे पुण्य की प्राप्ति तभी संभव है जब स्वयं के बारे में सोचने के साथ दूसरों के प्रति भी निस्वार्थ भावना हो।
इंदिरा एकादशी और पितृ पक्ष के बीच क्या संबंध है?
पितृ पक्ष पूर्वजों की मुक्ति से जुड़ा पखवाड़ा है और इंदिरा एकादशी इसी पखवाड़े के बीच पड़ने वाली तिथियों में एक है, जो पितृ दोष को कम करती है और पितरों को मोक्ष प्रदान करती है। मान्यता है कि आश्विन मास का कृष्ण पक्ष और इंदिरा एकादशी का दिन पूर्वजों की मुक्ति का द्वार खोलने के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसका कारण यह है कि, इस पखवाड़े में अर्जित किया गया आध्यात्मिक पुण्य सीधे पूर्वजों तक पहुंचता है। इन दिनों में उपवास रखने के साथ पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करने से पितृ दोष में कमी आती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
इंदिरा एकादशी और पितृ पक्ष में भिन्नता
- पितृ पक्ष की अवधि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक होती है। वहीं इंदिरा एकादशी आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की 11वीं तिथि को पितृ पक्ष के मध्य पड़ती है।
- पितृ पक्ष के 15-16 दिन पूर्वजों को मोक्ष दिलाने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि इंदिरा एकादशी व्रत के फल से पूर्वज को स्वर्गलोग का सुख मिलता है और यमलोक से मुक्ति मिलती है।
- श्राद्ध पक्ष का पूरा पखवाड़ा पितरों से संबंधित होता है, जबकि इंदिरा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित होता है।
- पितृ पक्ष के पखवाड़े में श्राद्ध की तिथि या निर्धारित तिथि पर विधि-विधान से कर्मकांड किए जाते हैं। वहीं इंदिरा एकादशी पर आप उन पितरों के निमित्त भी तर्पण और पिंडदान कर सकते हैं, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है।
- पितृ पक्ष के पूरे पखवाड़े में परिवार के सदस्य उपवास नहीं रखते हैं। जबकि दूसरी ओर इंदिरा एकादशी पर परिवार से सदस्य अपने और अपने पूर्वजों के बुरे कर्मों को कम करने के लिए व्रत रख सकते हैं।
