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पापांकुशा एकादशी 2026 तिथि , कथा और महत्व

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026 · शुक्ल पक्ष, एकादशी तिथि — पापों पर अंकुश लगाकर स्वर्ग प्रदान करता है.

शुक्ल पक्षआश्विन मासद्वादशी पर पारणअन्न-रहित व्रत
व्रत के बारे में पूछें
तिथि
22 अक्टूबर 2026
दिन
गुरुवार
पक्ष
शुक्ल
तिथि
एकादशी
चंद्र मास
आश्विन
आज से
10 दिन बाद

व्रत एवं पारण का समय

एकादशी तिथि भर व्रत रखा जाता है और अगली सुबह द्वादशी पर पारण समय-सीमा में तोड़ा जाता है। नीचे दिए समय नई दिल्ली के लिए हैं और अनुमानित हैं — अपने शहर के लिए पंचांग से सटीक तिथि और पारण की पुष्टि करें।

पापांकुशा एकादशी
विष्णु व्रत

पापांकुशा एकादशी

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

पारण · व्रत तोड़ना
06:22 AM – 08:28 AM
अवधि
2 घंटे 06 मिनट
उपवास समय-सीमा
सूर्योदय 22 अक्टूबर → 06:22 AM, 23 अक्टूबर
व्रत
अन्न-रहित
एकादशी तिथि आरंभ03:15 PM, गुरुवार 22 अक्टूबर
एकादशी तिथि समाप्त05:38 PM, शुक्रवार 23 अक्टूबर

समय नई दिल्ली के लिए हैं और आपके स्थान के अनुसार बदलते हैं। आज का पंचांग देखें अपने शहर के लिए।

व्रत कैसे रखें

प्रातःकालीन संकल्प से लेकर द्वादशी पर पारण तक — चार सरल चरण।

संकल्प एवं स्नान

ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान करें और शुद्ध एवं स्थिर मन से व्रत का संकल्प लें।

विष्णु पूजा

तुलसी, पुष्प, धूप और घी के दीपक से भगवान विष्णु की पूजा करें; फल और पंचामृत अर्पित करें।

उपवास एवं जाप

अन्न और दालों का त्याग करें। दिन भर जप, कथा और दान में लगे रहें और रात्रि जागरण करें।

पारण

द्वादशी की प्रातःकाल में निर्धारित समय-सीमा के भीतर, दीन-दुखियों को भोजन कराने के बाद व्रत तोड़ें।

अगली सुबह — पारण

व्रत तभी पूर्ण होता है जब इसे सही ढंग से तोड़ा जाए: द्वादशी तिथि पर, पारण समय-सीमा में और एकादशी समाप्त होने के बाद। 2026 में पापांकुशा एकादशी का पारण गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026 की अगली सुबह, नई दिल्ली में पड़ता है।

पापांकुशा एकादशी भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित महत्वपूर्ण एकादशी व्रतों में से एक है, जो आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि में पड़ती है। इसे सुख, समृद्धि और मोक्ष प्रदायक व्रत माना जाता है। हिंदू परंपरा के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा करने और व्रत रखने की मान्यता है। धार्मिक ग्रंथों में पापांकुशा एकादशी का महत्व सर्वोपरि बताया गया है, इसलिए हर किसी को इसके महत्व के बारे में जरूर जानना चाहिए। अगर आप जानना चाहते हैं कि, पापांकुशा एकादशी 2026 में कब है, पूजा की विधि क्या, नियम क्या है, इसकी व्रत कथा क्या है और पारण का समय क्या है तो इम सभी के बारे में आगे विस्तारपूर्वक बताया गया है।

पापांकुशा एकादशी 2026 तिथि और मुहूर्त

अगर आप पापांकुशा एकादशी व्रत की तिथि और मुहूर्त के बारे में जानना चाहते हैं तो, यहां नीचे तालिका में सटीक तिथि, एकादशी तिथि प्रारंभ, समाप्ति और पारण का मुहूर्त बताया गया है।

 

पापांकुशा एकादशी

तिथि और मुहूर्त

पापांकुशा एकादशी व्रत

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

आश्विन शुक्ल एकादशी तिथि प्रारंभ

21 अक्टूबर, दोपहर 2:11 से शुरू

आश्विन शुक्ल एकादशी तिथि समाप्त

22 अक्टूबर, दोपहर 2:47 बजे तक

पापांकुशा एकादशी पूजा मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4:45 से 5:36) शुभ चौघड़िया (सुबह 9:07 से 10:35),अभिजीत मुहूर्त (दोपहर 11:43 से 12:28)

पापांकुशा एकादशी पारण का समय

23 अक्टूबर, सुबह 6:27 से 8:42 बजे तक

नोट: पापांकुशा एकादशी व्रत पारण का समय नई दिल्ली के अनुसार है। आप अपने शहर के अनुसार सटीक समय जानने के लिए यहां आज का पंचांग देख सकते हैं।

पापांकुशा एकादशी व्रत का अर्थ

पापाकुंशा एकादशी का नाम दो शब्दों के संयोजन से बना है। पाप का अर्थ है बुरे कर्म और अंकुशा का अर्थ है नियंत्रित करने वाला या रोक लगाने वाला। इस एकादशी के नाम से ऐसी वस्तु की छवि मन में आती है, जो किसी शक्तिशाली चीज की शक्ति को नियंत्रित करती है। लेकिन असल में पापांकुशा एकादशी हानिकारक प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने वाली, अनुशासित बनाने वाली और आध्यात्मित मार्ग पर ले जाने में सहायक होती है। इस प्रकार पापांकुशा एकादशी व्रत-पूजन से पूर्व में किए गए पाप कर्मों को दूर करने और ऊर्जा को सही दिशा देने में मददगार हो सकता है। इससे अनुशासित रहने, खान-पान के प्रति सजग पहने और भगवान की आध्यात्मिक ऊर्जा से जुड़ने का अवसर प्रदान होता है।

अगर आप पापांकुशा व्रत के बारे में अंग्रेजी में पढ़ना चाहते हैं, तो Papankusha Ekadashi पर देख सकते हैं।

पापांकुशा एकादशी व्रत का महत्व

पापांकुशा एकादशी व्रत का महत्व इस दिन उपवास रखने के अनेकों लाभों में निहित है। नीचे इसके बारे में विस्तार से जानें।

कर्मों का शुद्धिकरण

पापांकुशा एकादशी व्रत बुरे कर्मों का शुद्धिकरण करने का अवसर होता है। इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु से प्रार्थना करने से जाने-अनजाने में किए बुरे कर्मों से मुक्ति मिलती है।

वंशजों को मिलता है पुण्य फल

पापांकुशा एकादशी व्रत का महत्व बताते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, इस एकादशी व्रत का पुण्य फल वंशजों को भी मिलता है। पापांकुशा एकादशी इतनी शक्तिशाली मानी जाती है कि इसका लाभ तीन वंशों का उद्धार कर सकता है। इसमें पिता के पक्ष से 10 पीढ़ियां, माता के पक्ष से दस पीढ़ियां और जीवनसाथी के पक्ष से दस पीढ़ियां शामिल होती हैं। इसलिए इस व्रत को न सिर्फ आपके लिए बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी लाभकारी माना जाता है। 

आत्म-नियंत्रण और अनुशासन

पापंकुशा एकादशी का व्रत निर्जला से लेकर फलाहार या सात्विक भोजन से रखा जा सकता है। यह पूरी तरह से आपकी श्रद्धा और शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है कि आप यह व्रत कैसे रखते हैं। हालांकि आप जिस प्रकार के व्रत का संकल्प लें, उसे पूरे नियम के साथ पूरा करें। एकादशी व्रत आपको आत्मसंयम और भोजन के चुनाव में अनुशासन सिखाता है। 

आध्यात्मिक पुण्य प्राप्ति

पापांकुशा एकादशी व्रत का गहरा संबंध दान से जुड़ा है। इस दिन अपने सामार्थ्यनुसार दान करने से आध्यात्मिक पुण्य प्राप्ति की मान्यता है। खासकर पापांकुशा एकादशी पर तिल, भूमि, सोना, भोजन, जल और अन्य वस्तुओं के दान का महत्व है।

पापांकुशा एकादशी व्रत विधि

दशमी तिथि

पापांकुशा एकादशी व्रत का व्यावहारिक आरंभ एक दिन पूर्व यानी दशमी तिथि से हो जाता है। दशमी के दिन बिना लहसुन-प्याज वाला भोजन करना चाहिए। इस दिन सूर्यास्त से पहले सात्विक भोजन करने की सलाह दी जाती है। इसका कारण यह है कि एकादशी व्रत की शुरुआत में पाचन तंत्र पूरी तरह से शुद्ध रहता है।  

एकादशी की सुबह 

एकादशी व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठना चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त में उठना अच्छा माना जाता है। सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और फिर साफ कपड़े पहन लें। लेकिन इस बात का भी ध्यान रखें कि व्रत में शारीरिक स्वच्छता के साथ मानसिक शुद्धता भी महत्वपूर्ण है। इस दिन आपका पूरा ध्यान प्रभु की भक्ति में होना चाहिए। इसलिए किसी से वाद-विवाद करने, कटु वचन बोलने, बड़ों का अपमान करने या मन में किसी प्रकार के गलत विचार लाने से बचें।

संकल्प

स्नान के बाद संकल्प का चरण भी महत्वपूर्ण होता है। स्नान करने के बाद भगवान के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना करें और व्रत का संकल्प लें। साथ ही भगवान के सामने यह भी संकल्प लें कि, आप पापांकुशा एकादशी का व्रत किस प्रकार (निर्जला,जलाहार,फलाहार) से रख रहे हैं।

पापांकुशा एकादशी व्रत के प्रकार

पापांकुशा एकादशी का व्रत आप कैसे रखते हैं यह पूरी तरह से आपकी श्रद्धा और शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है। आप नीचे दिए गए व्रतों में किसी एक का चुनाव कर संकल्प ले सकते हैं और व्रत का पालन कर सकते हैं।

  • निर्जला व्रत: जलहीन या निर्जला व्रत ऐसा व्रत है जिसमें द्वादशी तिथि के पारण तक भोजन और जल का सेवन पूर्णत: वर्जित होता है। यानी इस व्रत में अन्न-जल का पूरी तरह से त्याग करना पड़ता है।
  • जलाहार व्रत:  इस व्रत में आप पूरे दिन सिर्फ एक बार जल, नारियल पानी या नींबू पानी का सेवन कर सकते हैं। इसके अलावा फलों का जूस भी ले सकते हैं।
  • फलाहार व्रत: जैसे कि नाम से ही पता चलता है कि, ऐसे व्रत में फलों का सेवन किया जा सकता है।
  • क्षीरभोजी व्रत: इस व्रत के दौरान आप दूध से बनी चीजों का सेवन कर सकते हैं।
  • नक्तभोजी व्रत: इस व्रत में संध्याकाल के दौरान एक बार सात्विक चीजों का भोजन किया जा सकता है। खासकर व्रत में मान्य खाद्य पदार्थ जैसे कुट्टू, राजगीरा, सिंघाड़े का आटा, काली मिर्च, आलू, जीरा, घी, अरबी और शकरकंद जैसी चीजों से बना भोजन खा सकते हैं।

पापांकुशा एकादशी व्रत-पूजा के नियम

  • पापांकुशा एकादशी की पूजा में भगवान विष्णु को तुलसी के पत्ते जरूर चढ़ाएं।
  • व्रत के दौरान कठोर या अप्रिय शब्दों का प्रयोग न करें। किसी के साथ वाद-विवाद में न पड़ें और चुगली करने से बचें।
  • व्रत वाले दिन व्रतधारी को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
  • पापांकुशा एकादशी का व्रत रखकर दिन के समय सोने से बचें। अधिक से अधिक समय भगवान का नाम लेने या मंत्र जाप में बिताएं।
  • द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले और सूर्योदय के बाद ही पापांकुशा एकादशी व्रत का पारण करना चाहिए।

पापांकुशा एकादशी पूजा सामग्री

अगर आप पापांकुशा एकादशी व्रत रख रहे हैं तो आपको पूजा से जुड़ी सामग्रियों के बारे में जरूर जान लेना चाहिए। यहां पूजा के लिए कुछ जरूरी सामग्रियां बताई गई हैं, जो पूजा के दौरान आपके बहुत काम आ सकती हैं। हालांकि ये बुनियादी वस्तुएं हैं। परंपरा और रीति-रिवाज के अनुसार ये सामग्रियां थोड़ी भिन्न हो सकती हैं।

  • भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर
  • तुलसी के पत्ते
  • पीले फूल
  • दीया
  • घी या तेल
  • पीले वस्त्र
  • धूप या अगरबत्ती
  • बाती
  • पीला चंदन 
  • शुद्ध पानी
  • मौसमी फल
  • प्रसाद
  • पीले या लाल रंग का कपड़ा
  • लकड़ी की चौकी
  • कलश
  • पापांकुशा एकादशी व्रत कथा की पुस्तक
  • बैठने के लिए आसन

पापांकुशा एकादशी पूजा विधि

पापांकुशा व्रत की विधि, व्रत नियम और जरूरी पूजा सामग्री जानने के बाद आपको इस एकादशी की पूजा विधि के बारे में भी जरूर जानना चाहिए। जानें पापांकुशा एकादशी की पूजा विधि के बारे में-

  • स्नान करें: पूजा विधि आरंभ करने से पहले सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहन लें। एकादशी के दिन पीले रंग के कपड़े पहनना सबसे शुभ होता है। इसके अलावा लाल, हरा, गुलाबी जैसे शुभ रंगों के कपड़े भी पहन सकते हैं। लेकिन इस दिन काला, नीला, ग्रे, सफेद या भूरा रंग पहनकर पूजा करने से बचें।
  • पूजा स्थल का शुद्धिकरण: जिस स्थान पर आपको पूजा करनी है, उस स्थान की अच्छे से साफ सफाई करें और गंगाजल छिड़कर शुद्ध कर लें।
  • चौकी स्थापित करें: पूजा आरंभ करने से पूर्व साफ किए हुए स्थल या फिर पूजास्थल पर एक लकड़ी की चौकी स्थापित करें और इस पर पीले रंग का कपड़ा बिछा लें। अब चौकी के ऊपर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
  • कलश स्थापना: विशेष पूजा-पाठ के दौरान कलश की स्थापना करना जरूरी होता है। इसलिए चौकी की स्थापना करने के बाद कलश स्थापना भी जरूर करें। इसके लिए एक पीतल का कलश लेकर उसमें जल और गंगाजल भरें। कलश में तिलक लगाएं और कलावा बांधें। कलश के भीतर सिक्का, फूल, सुपारी डालकर ऊपर से आम के पाँच पत्ते रखकर कलश को ढक दें। 
  • पूजा करें: चौकी, कलश और प्रतिमा की स्थापना के बाद आसन बिछाकर बैठ जाएं और पूजा शुरू करें। भगवान को चंदन का तिलक लगाकर सुपारी, फूल, फल, तुलसी के पत्ते, नैवेद्य और भोग आदि अर्पित करें।
  • मंत्र, आरती और कथा: सभी पूजा सामग्रियां अर्पित करने के बाद भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें, फिर पापांकुशा एकादशी व्रत की कथा पढ़ें या सुनें और आखिर में आरती करके पूजा संपन्न करें।
  • दान: पापांकुशा एकादशी पर जरूरतमंदों में अपने सामर्थ्यनुसार दान जरूर करें। इस दिन दान करना सबसे पुण्य माना जाता है। आप मंदिर में भी दान कर सकते हैं।
  • पारण करें: एकादशी तिथि पर अपने संकल्प के अनुसार व्रत रखें और अगले दिन द्वादशी तिथि पर व्रत का पारण करें। एकादशी व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना चाहिए। इस बात का भी ध्यान रखें कि, एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली चौथाई अवधि होती है। श्रद्धालुओं को व्रत का पारण करने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

पापांकुशा एकादशी व्रत कथा

धर्मराज युधिष्ठिर ने कृष्ण से कहा- हे मधुसूदन! आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और क्या महत्व है, कृपया मुझे बताइए। 

श्रीकृष्ण बोले—राजन्! आश्विन के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है, उसका नाम ‘पापांकुशा'(Papankusha) है। वह सब पापों को हरने वाली, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान कराने वाली, शरीर को निरोग बनाने वाली है। यदि व्यक्ति सभी एकादशी का व्रत नहीं कर पाता तो एकमात्र इस एकादशी का व्रत करने से उसके पाप कर्म दूर होते हैं और कभी यम-यातना नहीं मिलती।

इसके बाद भगवान कृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर को पापांकुशा एकादशी की पवित्र कथा सुनाते हैं। राजन्! प्राचीन समय में महाबली नामक एक अत्याचारी राजा राज करता था। वह हर प्रकार के बुरे कर्म करता था, अपने प्रजा पर अत्यधिक अत्याचार करता था, निर्दोष जानवरों का शिकार करता था, गुस्सैल स्वभाव का था और शराब पीता था। अपनी इस जीवनशैली के कारण उसने बुरे कर्मों का संचय किया था। 

धीरे-धीरे राजा की उम्र बढ़ने लगी और मृत्यु का समय निकट आ गया। राजा इस बात ये दुखी रहने लगा कि, उसने अपने जीवन में बहुत बुरे कर्म किए हैं, जिस कारण उनसे नरक का दुख भोगना पड़ेगा। चिंतित होकर राजा तुरंत ऋषि अंगिरा के पास पहुंचा और उनसे पूछा कि निम्न लोकों में होने वाले निर्मम कर्मों से मुक्ति पाने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए। ऋषि ने कहा कि जो कोई भी अश्विन माह के शुक्ल पक्ष में पापांकुशा एकादशी का व्रत रखकर भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा करता है, वह अपने संचित पापों से मुक्त हो सकता है। 

महाबली राजा ने ऋषि की हर बात सुनी और नियमों के अनुसार पापांकुशा एकादशी व्रत का पालन किया। उसने सुबह जल्दी उठकर व्रत का संकल्प लिया, नियमों के अनुसार उपवास रखा, दिन भर भगवान पद्मनाभ का नाम जप किया और रातभर भजन सुनते और शास्त्र पढ़ा। इस प्रकार राजा ने पूर्ण श्रद्धा से पापांकुशा एकादशी व्रत संपन्न किया। इस प्रकार राजा ने अपने जीवन का आखिरी समय आध्यात्मिकता से बिताया और जब मृत्यु निकट आया तो यमराज के यमदूत नहीं बल्कि भगवान विष्णु के दूत उन्हें लेने आए और उन्हें भगवान विष्णु के निवास स्थान वैकुंठ ले गए। 

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा—राजन् ! तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, उसके अनुसार ‘पापांकुशा एकादशी’ का माहात्म्य मैंने वर्णन किया। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पापांकुशा एकादशी को पाषांकुश एकादशी और आश्विन शुक्ल एकादशी के नाम से जाना जाता है।
जिस एकादशी तिथि में दशमी तिथि का योग हो, उस एकादशी का व्रत नहीं करना चाहिए। इसे विद्धा एकादशी कहा जाता है और इसे त्यागने योग्य माना जाता है।
हां, यदि आपने पापांकुशा एकादशी व्रत को निर्जला रखने का संकल्प नहीं लिया है और आप पानी पी सकते हैं।
पापांकुशा एकादशी व्रत मनुष्य के जाने-अनजाने किए पापों को नष्ट कर मोक्ष प्रदान करता है।