फाल्गुन पूर्णिमा का दिन भारत में बहुत ही ख़ास माना जाता है। देश के कई हिस्सों में लोग इस दिन को होलिका दहन और होली की रूप में मनाते हैं, लेकिन पूर्वी भारत में इस दिन को डोल पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। यही वजह है कि हर साल लोग यह जानना चाहते हैं कि डोल पूर्णिमा कब है dol purnima kab hai, dol purnima tithi। डोल पूर्णिमा का पर्व भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की भक्ति को समर्पित है। इस दिन मंदिरों में राधा-कृष्ण को विशेष रूप से तैयार किया जाता है, भजन-कीर्तन होते हैं और उन्हें फूलों के झूलों यानी डोल में विराजमान किया जाता है। डोल पूर्णिमा का पर्व प्रेम, भक्ति और उल्लास का संदेश देती है।
डोल पूर्णिमा मंगलवार, 3 मार्च 2026 को है।
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 2 मार्च 2026 को शाम 5 बजकर 55 मिनट से
पूर्णिमा तिथि का समापन: 3 मार्च 2026 की शाम 5 बजकर 07 मिनट तक
डोल पूर्णिमा हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। इसे कई जगहों पर डोल यात्रा, डोल उत्सव और वसंत पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। ‘डोल’ का अर्थ झूला होता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की प्रतिमाओं को सुंदर झूले में बैठाकर पूजा की जाती है।
डोल पूर्णिमा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसी दिन चैतन्य महाप्रभु की जयंती भी मनाई जाती है। वैष्णव परंपरा में चैतन्य महाप्रभु को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है। इसलिए पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम जैसे राज्यों में यह पर्व बड़े उत्साह और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार डोल पूर्णिमा के दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा, भजन-कीर्तन और दान-पुण्य करने से जीवन में सुख, शांति और सकारात्मकता आती है।
इस दिन की गई पूजा से भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है। यह पर्व वसंत ऋतु के आगमन का भी प्रतीक माना जाता है। चारों ओर खिलते फूल, सुहावना मौसम और रंगों का उत्साह इस दिन को और भी खास बना देता है। यही कारण है कि डोल पूर्णिमा को प्रेम, भक्ति, सौहार्द और नई शुरुआत का पर्व भी कहा जाता है। यह पर्व केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि यह वसंत ऋतु के स्वागत और प्रेम, भक्ति तथा सद्भाव का भी प्रतीक माना जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के प्रेम और भक्ति को डोल पूर्णिमा का मुख्य आधार माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रीकृष्ण अपने भक्तों पर प्रेम और कृपा की बरसात करते हैं। इसी कारण मंदिरों में राधा-कृष्ण को रंग और अबीर अर्पित किया जाता है। भक्तजन भजन गाते हैं, कीर्तन करते हैं और भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
पश्चिम बंगाल में डोल पूर्णिमा सबसे प्रमुख त्योहारों में से एक मानी जाती है। सुबह से ही मंदिरों में पूजा शुरू हो जाती है। राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं को फूलों और रंग-बिरंगे वस्त्रों से सजाया जाता है। भक्त भगवान को अबीर अर्पित करते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और जुलूसों में भाग लेते हैं। नवद्वीप और मायापुर में तो इस दिन विशेष उत्साह देखने को मिलता है, जहां हजारों श्रद्धालु एकत्र होकर भगवान के नाम का जाप करते हैं। इसके अलावा, डोल पूर्णिमा के अवसर पर पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन में बसंत उत्सव भी मनाया जाता है। इसकी शुरुआत गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी। इस दिन विद्यार्थी पीले और केसरिया रंग के वस्त्र पहनते हैं। संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से वसंत ऋतु का स्वागत करते हैं।
वहीं ओडिशा में डोल पूर्णिमा को डोल यात्रा या डोला जात्रा के नाम से जाना जाता है। यहां भगवान कृष्ण की प्रतिमा को विशेष रूप से सजाई गई पालकी यानी डोला में बैठाकर नगर भ्रमण कराया जाता है। भक्तजन भगवान को अबीर अर्पित करते हैं और कई अलग-अलग-तरह से भोग लगाते हैं। कई स्थानों पर यह उत्सव कई दिनों तक चलता है और पूर्णिमा के दिन विशेष पूजा के साथ इसका समापन होता है।
डोल पूर्णिमा कैसे मनाई जाती है?
इस शुभ दिन पर, कृष्ण और राधा की मूर्तियों को भव्य रूप से सजाया जाता है और उन्हें झूले में डालकर झूलाया जाता है।
2026 में डोल पूर्णिमा कब है?
3 मार्च 2026 (मंगलवार) को है।
पूर्णिमा के दिन क्या चढ़ाना चाहिए?
इस दिन देवताओं को विशेष रूप से खीर (चावल या दूध की), पंचामृत, ताजे फल, पीले फूल, और घी का दीपक अर्पित करना चाहिए।
डोल उत्सव कहां का है?
डोल उत्सव मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, असम, और ओडिशा का एक प्रसिद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक त्योहार है।
डोल जात्रा उत्सव कब मनाया जाता है?
यह उत्सव फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है।
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